भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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अष्टादशोऽध्यायः 卐 प्रासादोर्ध्ववर्गाः २१९ सुन्दर वस्त्र से तथा श्वेत पुष्पों से सजा कर मण्डप को मनोहर बनाना चाहिये।।१६७।। तस्य मध्ये तु शालीभिः स्थण्डिलं दण्डमानतः ॥१६८॥ उसके मध्य भाग में शालिधान्य से एक दण्ड प्रमाण का स्थण्डिल वास्तुमण्डल निर्मित करना चाहिये ।।१६८।। कृत्वाष्टाष्टपदं न्यस्य ब्रह्मादीन् वस्तुनायकान् । श्वेततण्डुलधाराभिर्विन्यस्याराध्य पुष्पकैः ॥१६९॥ गन्धैर्धूपैश्च दीपैश्च बलिं दत्त्वा विधानतः । तदूर्ध्वं पञ्चपञ्चैव कलशान् वस्त्रशोभितान् ॥१७०॥ चौंसठ पद बनाकर श्वेत चावल से ब्रह्मा आदि वास्तुदेवताओं को क्रमानुसार स्थापित कर तथा पुष्प-गन्ध-धूप-दीप आदि से उनकी पूजा कर उन्हें विधिपूर्वक बलि प्रदान करनी चाहिये। इसके ऊपर वस्त्रों से सुशोभित पच्चीस कलश रखना चाहिये। मणिहेमसमायुक्तान् ससूत्रान् सापिधानकान् । निष्कलङ्कान्सुषिरान् हाटकोदकपूरितान् ॥१७१॥ उपपीठपदस्थांस्तान् स्वस्वनाम्नाभिधाय च। ओङ्कारादिनमोऽन्तेन चार्चयित्वा न्यसेत्ततः ॥१७२॥ इन कलशों को रत्नों, सुवर्ण, सूत्रों एवं ढक्कनों से युक्त करना चाहिये। ये कलश दोषरहित, छिद्ररहित एवं हाटक-जल ( सुनहरा, पीला जल ) अथवा धतूरायुक्त जल से भरे होने चाहिये। उपपीठ वास्तुमण्डल पर रक्खे गये प्रत्येक घट को उस-उस वास्तुदेवता ( जिसके पद पर कलश हो ) का नाम लेते हुये ओंकार से प्रारम्भ कर नमः से अन्त करते हुये वास्तुदेवता की पूजा ( आवाहन करते हुये ) करनी चाहिये। कलशस्योत्तरे पार्श्वे दर्भासनपरिस्तरे । चतुष्प्रदीपसंयुक्ते सर्वमङ्गलशोभिते ॥१७३॥ पूतचेता विशुद्धात्मा स्थपतिर्व्रतमास्थितः । पीत्वा शुद्धं पयो रात्रावुपोष्याधिवसेत्ततः ॥१७४॥ पवित्र मन एवं आत्मा वाले, व्रत में स्थित स्थपति को शुद्ध जल पीकर उपवास रखते हुये कलश के उत्तरी भाग में कुश के बिस्तर पर, जिसके चतुर्दिक चार दीपक जल रहे हों एवं जो माङ्गलिक पदार्थों से सुशोभित हो, रात्रि में निवास करना चाहिये।।१७३-१७४।। प्रासादस्याग्रतो यागमण्डपं विधिनाचरेत् । चतुर्द्वारसमायुक्तं चतुस्तोरणभूषितम् ॥१७५॥