भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

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२२४ मयमतम् स्थापक को गन्ध एवं पुष्प आदि से पूजा करनी चाहिये तथा नैवेद्य प्रदान करना चाहिये; साथ ही देवालय के प्रधान देवता को निमित्त बना कर प्रासाद के बीज-मन्त्र का न्यास करना चाहिये॥२०१॥ ☀ दक्षिणादानम् ☀ प्रासादाभिमुखे स्थित्वा यजमानः प्रसन्नधीः। स्थपतेर्धर्मसर्वस्वं क्लेशेन सह यद् भवेत्॥२०२॥ तत् सर्वं परिगृह्णीत सुप्रीत्या स्थापकाज्ञया। पूजयेत्तु यथाशक्ति स्थापकं स्थपतिं ततः॥२०३॥ दक्षिणा एवं दान—प्रसन्न-मति यजमान देवालय के सम्मुख खड़े होकर स्थपति के सम्पूर्ण धर्म (उत्तरदायित्व) को, जो उसके ऊपर कष्ट के साथ थे, उन सबको प्रसन्न भाव से स्थापक की आज्ञा से ग्रहण करे एवं शक्ति के अनुसार स्थापक एवं स्थपति का सत्कार करे॥२०२-२०३॥ पुत्रभ्रातृकलत्रैश्च यजमानो मुदा धनैः। धान्यैश्च पशुभिर्वस्त्रैर्वाहनैर्भूमिदानकैः॥२०४॥ शेषानपि च तक्षादिविष्ठिसर्वान् स कर्मणि। सन्तर्पयेद्धिरणयैश्च वस्त्रैर्वाऽपि मनोहरैः॥२०५॥ अपने पुत्र, भाई एवं पत्नी के साथ यजमान धन, अन्न, पशु, वस्त्र, वाहन तथा भूमि के दान से एवं सोने तथा सुन्दर वस्त्रों से शेष तक्षक आदि सभी शिल्पियों को भी सन्तुष्ट करे॥२०४-२०५॥ विमानस्तूपिकास्तम्भमण्डपालङ्कृतान्यपि । वस्त्रादीनि ध्वजं धेनुं प्रीत्या स्थपतये ददेत्॥२०६॥ विमान, स्तूपिका (स्तूपिका), स्तम्भ एवं मण्डप को अलङ्करणों से युक्त, वस्त्रादि, ध्वज एवं गाय को प्रसन्न भाव से स्थपति को देना चाहिये॥२०६॥ ☀ सम्प्रोक्षणावश्यकता ☀ एवमेवं कृतं वस्तु वर्धयेन्नित्यमा युगात्। यजमानस्त्विहामुत्र फलं सम्यग् लभेद् दृढम्॥२०७॥ सम्प्रोक्षण की आवश्यकता—इस प्रकार से निर्मित वास्तु युगों तक नित्य वृद्धि को प्राप्त होता है। यजमान को इस लोक एवं परलोक में स्थिर फल भली-भाँति प्राप्त होता है॥२०७॥