भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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अष्टादशोऽध्यायः 卐 प्रासादोर्ध्ववर्गाः २२५ अन्यथा चेत् फलं नैव लभते तत्र वस्तुनि । भूतप्रेतपिशाचादिराक्षसाश्च वसन्त्यलम् ॥२०८॥ तस्मात् प्रासादनिष्पन्ने सर्वथा प्रोक्षणं चरेत् । यदि वास्तु-कृत्य अन्य विधि से होता है तो वह वास्तु फलदायी नहीं होता है। उस भवन में भूत, प्रेत, पिशाच एवं राक्षस निवास करते हैं। इसलिये प्रासाद निर्मित हो जाने पर सब प्रकार से प्रोक्षण कर्म अवश्य करना चाहिये ॥२०८॥ मण्डपे च सभायां वा रङ्गे विहारशालके ॥२०९॥ हेमगर्भसभायां तु त्तुलाभारकूटके । विश्वकोष्ठे प्रपायां च धान्यागारे महानसे ॥२१०॥ वास्तुदेवबलिं दत्त्वाधिवास्य विधिना तथा । स्थपतिः पूतचित्तात्मा प्राप्तपञ्चाङ्गभूषणः ॥२११॥ नवाम्बरधरश्चैव नववस्त्रोत्तरीयकः । सर्वमङ्गलघोषैश्च जलसम्प्रोक्षणं चरेत् ॥२१२॥ मण्डप में, सभा में, रङ्गमण्डप में, विहारशाला में, हेमगर्भ के सभागार में, तुलाभारकूट में, विश्वकोष्ठ में, प्रपा ( जल का प्याऊ ) में, धान्यगृह में तथा रसोई में विधिपूर्वक वास्तुदेव को बलि प्रदान कर पवित्र चित्त एवं आत्मा से पाँच अङ्गों में आभूषण धारण कर, नवीन वस्त्र पहन कर तथा नवीन उत्तरीय ( ऊपर ओढ़ने का चादर ) धारण कर सभी प्रकार के मङ्गल-स्वर के साथ जलसम्प्रोक्षण कर्म सम्पन्न करना चाहिये ॥२०९-२१२॥ ✹ सम्प्रोक्षणकालः ✹ उत्तरायणमासे तु कृतं चेदुत्तमोत्तमम् । त्वरितेऽप्येवमेवं तु कुर्यात्तद् दक्षिणायने ॥२१३॥ सम्प्रोक्षण का समय—यदि सम्प्रोक्षण-कर्म उत्तरायण मासों में किया जाय तो अति उत्तम होता है। यदि शीघ्रता हो तो दक्षिणायन मासों में भी करना चाहिये।। २१३।। त्रिरात्रमेकरात्रं वा सद्योऽधिवासमेव वा । तत्रैवाविकले द्रव्ये लभेत् कर्ता महत् फलम् ॥२१४॥ कर्ता प्रासाद के पूरी तरह पूर्ण हो जाने पर तीन रात्रि, एक रात्रि अथवा उसी दिन वहाँ अधिवास करे तो वह महान् फल प्राप्त करता है।।२१४।। मय०-१५

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