भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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२२६ मयमतम् ✴ कलशस्थापनम् ✴ एकत्रिपञ्चकलशेषु तथाऽधिदेवा एकत्रिपञ्च कथिता इह मूर्त्तयस्ताः । तत्तत् स्वमन्त्रसहितं तदधः सहेम- रत्नं निधाय विधिना कलशान्न्यसेत्तत् ॥२१५॥ देवालय में एक, तीन या पाँच देवतामूर्ति हों तो एक, तीन या पाँच कलशों में मन्त्रसहित उनके नीचे सुवर्ण के साथ रत्न को रखकर विधिपूर्वक कलशों का न्यास करना चाहिये।।२१५।। एवं मुदा भवनकर्मसमाप्तिमत्र कुर्याज्जनेशजनगोकुलसम्पद्वृद्ध्यै । यद्वैपरीत्यमसमाप्तिकवस्तुवेशं तद्वास्तुदेवबलिहीनमनर्थदं स्यात् ॥२१६॥ इति मयमते वास्तुशास्त्रे शिखरकरणभवनकर्म- समाप्तिविधानं नामाष्टादशोऽध्यायः इस प्रकार प्रसन्नतापूर्वक भवन का निर्माण पूर्ण होता है तो गृहस्वामी, उसके परिवार, उसके परिजन एवं उसके गायों के वंश की वृद्धि होती है। इसके विपरीत वास्तुकार्य सम्पन्न होने पर एवं वास्तुदेवता के बलि से रहित होने पर वह निर्मित भवन अनर्थकारी होता है।।२१६।। व्याख्यात्मक टिप्पणी १. गललक्षण ( श्लोक २-६ ) इसका वर्णन शिल्परत्न (पूर्व., ३१ अ.) में विस्तार से प्राप्त होता है। यहाँ गल के प्रमाण, प्रकार एवं मूषा आदि इस प्रकार वर्णित हैं— ऊर्ध्वभूमेः पादतुङ्गं गलमानमुदाहृतम्। आद्यङ्घ्रोनततुल्यं वा गलोन्नतमिहोच्यते।। तदुच्चात् त्रिचतुष्पञ्चभागैकं वेदिकोन्नतम्। शेषं गलोदयं ख्यातमशेषं वा गलोदयम्।। त्रिचतुष्पञ्चहस्तं वा गलव्यासमुदाहृतम्। अङ्घ्रेर्वेद्यङ्घ्रिप्रवेशं यत्तद्वद्वा गलवेशनम्।।