भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

पृष्ठ 229, कुल 395 में से

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अष्टादशोऽध्यायः 卐 प्रासादोर्ध्ववर्गाः २०५ शोभा के अनुसार निष्क्रान्त होना चाहिये। उसके ऊपर त्रिमुख होना चाहिये, जो शूल के समान, मतल के सदृश, व्याल ( गज अथवा सर्प ) के सदृश अथवा नृत्यादि के दृश्यों से युक्त हो।।७७।। ❋ ललाटभूषणम् ❋ तदूर्ध्वे कूटकोष्ठादिमण्डितं स्याद् विमानवत्। सपट्टक्षुद्रकम्पाङ्गं मध्यतोरणमेव वा ॥७८॥ ललाट के अलङ्करण—उसके ऊपर कूट एवं कोष्ठ आदि से अलङ्कृत विमान ( मन्दिर ) के सदृश रचना होनी चाहिये, जो पट्ट, क्षुद्रकम्प आदि अङ्गों अथवा मध्य तोरण से युक्त हो।।७८।। तोरणाभ्यन्तरे लक्ष्मीः साभिषेकाम्बुजासिका। एवंविधैरथान्यैश्च मण्डनीया ललाटिका ॥७९॥ तोरण के मध्य में लक्ष्मी अङ्कित होनी चाहिये, जिनका ( गजों द्वारा ) अभिषेक किया जा रहा हो एवं हाथ में कमल-पुष्प हो। इस प्रकार अथवा अन्य विधि से ललाटिका को सजाना चाहिये।।७९।। ललाटवंशसंविद्धमध्यशूलदृढीकृता । स्तम्भविस्तारविस्तीर्णा विधातव्या कुठारिका ॥८०॥ तत्कर्णं पत्रमकरं मण्डितं चावलम्बितम्। अर्धकर्णेन चार्धं वा यथायुक्ति यथारुचि ॥८१॥ ललाट के वंश विद्ध, मध्य के शूल से दृढ़ बनाई गई, एक दण्ड विस्तृत कुठारिका होनी चाहिये। इसका कर्ण पत्र एवं मकर से अलङ्कृत तथा उस पर टिका होना चाहिये। अथवा पत्र तथा मकर मध्य में या अर्धकर्ण पर रुचि एवं योजना के अनुसार निर्मित करना चाहिये।।८०-८१।। ❋ स्तूपिका ❋ अन्तर्गतलुपातिर्यगग्रबन्धनविष्टकम् । तदूर्ध्वे तेन निर्विद्धं स्तूपिका यूपमिष्यते ॥८२॥ स्तूपिका—अग्र भाग ( ऊपरी भाग ) में जोड़े गये ईंटों के मध्य में तिरछी लुपायें प्रविष्ट होती हैं। उसके ऊपर उनको भेद कर स्थूपिका-यूप निकली होती है।।८२।। पूर्वोक्तं स्तूपिकामानमलङ्कारमथोच्यते। सार्धमर्धं तदूर्ध्वेऽर्धमर्धमंशं शरांशकम् ॥८३॥

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