मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०४ मयमतम् विस्तारो मुखपट्ट्याश्च दण्ड्यो वाध्यर्ध एव वा ॥७०॥ नीप्रं षडष्टभागं वा कर्णिकोच्चं तु तत्ततिः । शक्तिध्वजस्य मूलस्य विपुलं दण्डमानतः ॥७१॥ तत्कण्ठं तावदेवोच्चं सपादं सार्धमेव वा । ग्रीवान्तगग्रपत्रं तु स्तम्भव्यासार्धतुङ्गवत् ॥७२॥ मुखपट्टी का विस्तार एक दण्ड या डेढ़ दण्ड होना चाहिये। नीप्र का माप उसके छठवें या आठवें भाग के बराबर होना चाहिये एवं उसकी चौड़ाई कर्णिका की ऊँचाई के बराबर होनी चाहिये। शक्तिध्वज के मूल की चौड़ाई एक दण्ड होनी चाहिये। उसका कण्ठ उसके बराबर, उसका सवा भाग या डेढ़ भाग अधिक होना चाहिये। ग्रीवा के अन्त तक जाने वाले गग्रपत्र का मान स्तम्भ की चौड़ाई का आधा ऊँचा होना चाहिये। द्विदण्डादित्रिदण्डान्तमन्तरं गग्रपत्रयोः । वाताहतचलच्चारुलतावत् कर्णिकाक्रिया ॥७३॥ दो गग्रपत्रों के मध्य का भाग दो दण्ड से प्रारम्भ कर तीन दण्ड तक होना चाहिये। कर्णिका वायु के वेग से हिलती हुई लता की भाँति होनी चाहिये।।७३।। अर्धकर्णमधस्तस्माच्छिरोऽधार्धेन चानतिः । ग्रीवोपरि कपोलान्तं त्रिदण्डं सार्धमेव वा ॥७४॥ नीचे अर्धकर्ण होना चाहिये एवं उसके ऊपर शिर होना चाहिये। डेढ़ भाग से अनति होनी चाहिये। ग्रीवा के ऊपर कपोल-पर्यन्त का भाग तीन या साढ़े तीन दण्ड होना चाहिये।।७४।। तावच्छक्तिध्वजान्तं स्यात् सपत्रं वा सशूलकम् । नेत्रसंश्लिष्टमल्लं तु चूलिकास्तनमण्डलम् ॥७५॥ उससे पत्र एवं शूल से युक्त शक्तिध्वज लगा होना चाहिये। वहाँ नेत्र से युक्त मल्ल, चूलिका एवं स्तनमण्डल आदि निर्मित होना चाहिये।।७५।। शयितस्थितपट्टाभ्यां मृणाल्यादिविभूषितम् । अर्धकर्णोर्ध्वपट्टोर्ध्वप्रत्यूर्ध्वे मुष्टिबन्धनम् ॥७६॥ क्षैतिज स्थित पट्ट कमल आदि से अलङ्कृत होना चाहिये। अर्धकर्ण, ऊर्ध्वपट्ट एवं ऊर्ध्वप्रति के ऊपर मुष्टिबन्ध निर्मित होना चाहिये।।७६।। यथोशोभननिष्क्रान्तं त्रिमुखं स्यात् तदूर्ध्वतः । शूलाभं मतलाभं वा सव्यालं वा सनाटकम् ॥७७॥