मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टादशोऽध्यायः 卐 प्रासादोर्ध्ववर्गाः २०३ तथा अर्ध के मध्य में तुला के ऊपर मुण्ड ( सजावटी अङ्ग ) स्थापित करना चाहिये। विटभागशिखोपेततुलापादः सवंशहृत्। सवर्णा मत्स्यबन्धाश्च खर्जूरपत्रसन्निभाः ॥६४॥ विट भाग ( शीर्ष भाग ) शिखा से युक्त, तुला-पाद से युक्त, वंश से युक्त, वर्ण से युक्त, मत्स्य-बन्ध एवं खर्जूर-पत्र के समान आकृति से युक्त होती है॥६४॥ ⁕ पुनश्छादनम् ⁕ सवलयक्षो विधातव्या लुपाः शिखरकान्तरे । लुपोर्ध्वं फलकं वोर्ध्वं तस्याः कम्पं विधाय च ॥६५॥ इष्टकासुधया वाऽपि प्रच्छादनमलङ्क्रियात्। पुनः आच्छादन—शिखर के भीतरी भाग में वलयक्ष के साथ लुपा रखनी चाहिये। लुपा के ऊपर फलक अथवा कम्प रखना चाहिये तथा सुधा ( गारा ) एवं ईंटों से आच्छादन को सुन्दर बनाना चाहिये ( अर्थात् उन्हें सही एवं सुन्दर बनाना चाहिये ) । ⁕ स्थूपिकाकीलम् ⁕ स्थूपिकाकीले दीर्घं च पादोत्सेधसमं मतम् ॥६६॥ अर्धार्धमग्रविस्तारं दण्डार्धं मूलविस्तृतम्। आशङ्कुमूलमुण्डान्तं तस्य मूलस्य वेधनम् ॥६७॥ स्तूपिका की कील—स्थूपिका ( स्तूपिका ) के कील की लम्बाई स्तम्भ की लम्बाई के बराबर होनी चाहिये। इसके शीर्ष भाग की चौड़ाई चौथाई दण्ड एवं मूल की चौड़ाई आधा दण्ड होनी चाहिये। इसके मूल का वेधन शङ्कु के मूल से लेकर मुण्ड पर्यन्त होना चाहिये॥६६-६७॥ वंशाधस्तान्निधातव्या मण्डनागाग्रपट्टिका। बालकूटस्तनं शङ्कुमूलमुण्डकमेव च ॥६८॥ वंश के नीचे मण्डनाग, अग्रपट्टिका, बालकूट, स्तन, शङ्कुमूल एवं मुण्डक स्थापित करना चाहिये॥६८॥ अन्तःस्थवलयं वर्णपट्टिका च सनालिका। मत्स्यबन्धनखर्जूरपत्रमल्लनिबन्धनात् ॥६९॥ वलक्षस्वस्तिधाराभिः शिखरान्तरलङ्क्रियात्। शिखर के भीतरी भाग की सज्जा अन्तःस्थ वलय, नालियों से युक्त वर्णपट्टिका, मत्स्यबन्धन, खर्जूरपत्र, मलय, वलक्ष तथा स्वस्ति धाराओं से करनी चाहिये॥६९॥