भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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२०२ मयमतम् लुपा की चौड़ाई के मान से चौकोर घटिका का निर्माण करना चाहिये। यह एक वितस्ति ( बित्ता, बालिशत ) लम्बी, सीधी, मध्यम सूत्र से युक्त होती है॥५६॥ चूलिकान्तर्वर्णलुपातिर्यक् सूत्रस्वमध्यमात्। विन्यस्य घटिकां पश्चाच्छिद्रां शमनसूत्रवत् ॥५७॥ चूलिका, अन्तर्वर्ण, लुपा एवं तिर्यक् सूत्र के मध्य में घटिका को स्थापित करना चाहिये। इसके पश्चात् इसे शमन सूत्र के समान छिद्रयुक्त करना चाहिये॥५७॥ प्रतिवर्णं तु घटिकां तद्वर्णे तां निधापयेत्। क्षिप्तसूत्रस्य शेषांशच्छिद्रे वर्णलुपोदरे ॥५८॥ दण्डिकोत्तरवलयस्थितसूत्रसमं लिखेत्। उदरायाममध्ये तु लिखिते ककरं भवेत् ॥५९॥ प्रत्येक वर्ण की घटिका को उसके वर्ण पर स्थापित करना चाहिये। क्षिप्त सूत्र के शेष भाग के वर्ण लुपा के उदर भाग पर दण्डिका, उत्तर एवं वलय पर स्थित सम- सूत्र का आलेखन करना चाहिये। उदर भाग की लम्बाई के मध्य भाग में सम-सूत्र के अङ्कन से ककर निर्मित होता है॥५८-५९॥ घटिकाललाटमध्यं ककरं च समं यथा। तथा निधाय घटिकां लुपोदरवशायताम् ॥६०॥ तल्ललाटाकृतिच्छेद्या वलयाद्या लुपोदरे। इष्टपार्श्वे क्षिपेच्छायां छिद्रैश्च वलयस्य तु ॥६१॥ जिस प्रकार घटिका ललाट के मध्य में हो तथा ककर सम हो, उस विधि से लुपा के उदर भाग में लम्बाई में रखकर उसे ललाट की आकृति में काटना चाहिये। वलय आदि को लुपा के उदर भाग में इच्छित भाग रखना चाहिये। वलय के छिद्रों के साथ छाया को स्थापित करना चाहिये॥६०-६१॥ तत्तद्धटिकया तत्तन्मध्यसंहितमध्यया। या ललाटगतच्छाया तासां तासां तु सा भवेत् ॥६२॥ उस-उस घटिका के साथ तथा मध्य में स्थित उनके मध्य भाग से संयुक्त जो ललाट से सम्बद्ध छाया है, वह उन-उन ( घटिकाओं ) की होती है॥६२॥ दण्डिकावलयच्छिद्रस्तनजानूत्तरादिषु । शिरोमध्येऽर्धमध्ये च न्यसेन्मुण्डतुलोपरि ॥६३॥ दण्डिका, वलय, छिद्र, स्तन, जानु एवं उत्तर आदि पर, शिर के मध्य भाग में