मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टादशोऽध्यायः 卐 प्रासादोर्ध्ववर्गाः २०१ उस भाग से साढ़े सात से प्रारम्भ कर ढ़ाई भाग बढ़ाते हुये पन्द्रह संख्या तक ले जाना चाहिये। इस प्रकार सोलह परलेखायें बनती हैं॥४९॥ लुपाध ऊर्ध्वबिन्द्रादि मध्ये विन्यस्य तद्विधिम् । तद्विन्द्रादि विलोक्या हि परलेखा विचक्षणैः ॥५०॥ लुपा के नीचे एवं ऊपर बिन्द्रादि को मध्य में करना चाहिये। उस बिन्द्रादि से बुद्धिमान ( स्थपति ) को परलेखा का अवलोकन करना चाहिये॥५०॥ प्रासादानामिमाः प्रोक्ता गृहादीनां च षोडश। लुपायामाद्याद्विगुणं तन्मानं तेन बुद्धिमन् ॥५१॥ प्रासादों ( महलों, देवालयों ) की ये परलेखायें गृहों में सोलह संख्याओं में होती हैं। लुपाओं में प्रथम से दुगुना मान करते हुये उनका मान बुद्धिमान ( स्थपति ) को स्वीकार करना चाहिये॥५१॥ कोष्णीषासनसूत्राभ्यामधः शफरमालिखेत् । तस्मादुपरि मल्लस्य लेखयेत् तद्विचक्षणः ॥५२॥ क, उष्णीष तथा आसन सूत्र के नीचे शफर को अङ्कित करना चाहिये। उसके ऊपर बुद्धिमान ( स्थपति ) को मल्ल का अङ्कन करना चाहिये॥५२॥ मल्लायतादधोभागे त्रिःपञ्चांशीकृतेः क्रमात्। तत्तदंशावसानं तु मत्स्यं तत्तत् समुल्लिखेत् ॥५३॥ मल्ल के नीचे लम्बाई के पन्द्रह भाग करने चाहिये। उन-उन भागों के अन्त से मत्स्य की आकृति बनानी चाहिये॥५३॥ सर्वासां परलेखानां क्रमोऽयं परिकीर्तितः । पाञ्चालादिलुपानां च प्रत्येकं प्रोच्यते बुधैः ॥५४॥ सभी परलेखाओं का यही क्रम कहा गया है। पाञ्चाल आदि लुपाओं में से प्रत्येक के विषय में बुद्धिमानों ने वर्णन किया है॥५४॥ ऋजाकार्य्युता मल्लाद् या लेखासनकाग्रयोः । मध्ये परं हि सा प्राज्ञैः परलेखा प्रकीर्तिता ॥५५॥ आसन एवं क सूत्र के अग्रभाग से एवं मल्ल से संयुक्त, मध्य भाग एवं उसके बाद सीधी रेखा को बुद्धिमानों ने परलेखा कहा है॥५५॥ ✵ घटिका ✵ लुपाबाहुल्यमानेन घटिकां चतुरश्रिकाम् । वितस्त्यायामिनीमृज्वीं कृतमध्यमसूत्रिताम् ॥५६॥