मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०० मयमतम् कूट के व्यास के बराबर लुपा की पिण्डी होती है एवं कर्ण की लम्बाई उसकी दुगुनी होती है। उसके आधे माप का नालिका-लम्ब होता है। इसके ऊपर मल्ल के अग्र भाग को जोड़ा जाता है।।४३।। छिद्रं तत्तीव्रमात्रं स्यान्मल्लानां तु प्रवेशनम्। जानुकं च लुपामध्यं मध्यपृष्ठस्थवंशकम् ॥४४॥ समं स्यात् तीव्रताराभ्यां चूल्यंशो वा लुपान्तरम् । लुपातीव्राष्टगुणं वा वलयो वंशविस्तरः ॥४५॥ छिद्र उसकी मोटाई के अनुसार होना चाहिये, जिससे उसमें मल्लों का प्रवेश हो सके। जानुक, लुपामध्य एवं मध्य पृष्ठ पर स्थित वंश समान माप के होते हैं। उनकी मोटाई चूली के भाग अथवा लुपा के मध्य भाग के बराबर होती है। अथवा लुपा की मोटाई के आठवें भाग के बराबर वलय एवं वंश का विस्तार होता है।।४४-४५।। ✵ छादनम् ✵ तदर्धं वेशनं तीव्रं फलकैलौहलोष्टकैः । मृण्मयैस्तु यथास्थैर्यमिच्छया छादयेत् पुनः ॥४६॥ लुपोर्ध्वे फलकान् न्यस्य वाष्टबन्धमधोध्वर्तः । आच्छादन, छाजन—उपर्युक्त माप का आधा मोटा (आच्छादन होना चाहिये)। काष्ठ के फलकों, धातु के लोष्टकों (धातुनिर्मित पट्ट) अथवा मृत्तिका-निर्मित लोष्टकों से इच्छानुसार (भवन के शीर्ष को) इस प्रकार आच्छादित करना चाहिये, जिससे आच्छादन स्थिर रहे। लुपा के ऊपर फलकों (या लोष्टकों) को रखकर नीचे एवं ऊपर अष्टबन्ध (विशिष्ट गारा) लगाना चाहिये।।४६।। ✵ वलयसन्धिः ✵ लुपामध्यादधश्छिद्रं वलयस्य विधीयते ॥४७॥ क्रियायां परलेखास्तु कल्प्याः षोडशसंख्यया । कुक्षिव्यासाष्टभागैकं मात्रामानमिति स्मृतम् ॥४८॥ वलय की सन्धि—वलय के छिद्र लुपा के मध्य के नीचे होता है। इसके लिये सोलह संख्या में परलेखायें (विशिष्टरेखायें) निर्मित करनी चाहिये। इसका प्रमाण कुक्षि के व्यास के आठवें भाग के अङ्गुलिमान के बराबर होनी चाहिये।।४७-४८।। तेन भागेन सप्तार्थाद् द्वयर्धभागविवर्धनात् । आपञ्चदशसंख्यान्ताः परलेखास्तु षोडश ॥४९॥