भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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अष्टादशोऽध्यायः 卐 प्रासादोर्ध्ववर्गाः १९९ बालकूट के विस्तार में स्थित सूत्रस्तन के मध्य में, वलय के छिद्र के मध्य में स्थित कूट का मध्यम सूत्र होता है।।३६।। पर्यन्तसूत्रकादन्तर्दण्डिकोत्तरजा ततिः । तदन्तर्जानुकव्यासस्तदन्तश्शूलिकास्थितिः ॥३७॥ पर्यन्त-सूत्र से अन्तर-दण्डिका के वाम भाग में जो विस्तार होता है, वहाँ अन्तर्जानुक का व्यास एवं उसके मध्य में चूलिका की स्थिति होती है।।३७।। ☀ शिखरावयवमानानि ☀ लुपातारं तु दण्डं वा सपादं सार्धमेव वा । विस्तारत्रिचतुष्पञ्चभागेकांशं तु तद्धनम् ॥३८॥ शिखर के अङ्गों के प्रमाण—लुपा की चौड़ाई एक दण्ड, सवा दण्ड या डेढ़ दण्ड होती है तथा इसकी मोटाई का माप विस्तार का तीसरा, चौथा या पाँचवाँ भाग होता है।।३८।। जानुव्यासं चोत्तरार्धचूलिकार्धार्धमेव वा । दण्डिकाविपुलं तावत् त्रिपादार्थं तु तद्धनम् ॥३९॥ जानु का व्यास उत्तर का आधा अथवा चूलिका के आधे का आधा ( चतुर्थांश ) होना चाहिये। इसकी मोटाई दण्डिका के बराबर, तीन चौथाई अथवा आधी होनी चाहिये।।३९।। वलयं जानुनीव्रं च दण्डिकाविपुलार्धतः । मल्लमध्यादिचामीली जानुकालम्बनं च यत् ॥४०॥ पर्यन्तजानुकान्तं च चूलिकाभाग एव सः । शयनात् तावदेव स्यान्नीव्रीवालम्बनसूत्रकम् ॥४१॥ वलय एवं जानु के नीव्र ( किनारा ) का माप दण्डिका के विस्तार का आधा होना चाहिये। मल्ल का मध्य एवं आदि अमीली एवं जानु के आलम्बन से जानु के अन्त तक चूलिका का अंश होता है। नीव्री का आलम्बन-सूत्र शयन से होता है। कुठारिकाललाटं च जघनं च समं मतम् । पादविष्कम्भकर्णो वा विष्कम्भद्विगुणोऽथ वा ॥४२॥ कुठारिका, ललाट एवं जघन का मान एक समान होता है। पाद-विष्कम्भ एवं कर्ण का माप समान होता है अथवा विष्कम्भ का दुगुना होता है।।४२।। कूटव्यासो लुपापिण्डी कर्णस्तद्द्विगुणायतः । तदर्धं नालिकालम्बमूर्ध्वे मल्लाग्रसङ्गतिः ॥४३॥