मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
DevanagariHindipublished395 पृष्ठ
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१९८ मयमतम् होता है एवं इससे मल्ल की लम्बाई ज्ञात होती है।।२९।।
- पञ्चलुपाभेदाः * समध्यं च विमध्यं च लुपाकलनमेव हि। मध्यं च मध्यकर्णं चाप्याकर्णमनुकोटिकम् ।।३०।। कोटिरित्येवमुच्यन्ते पञ्च वर्णलुपाः क्रमात्। युग्मांशेऽयुग्मसंख्याभिरयुग्मे युग्मसंख्यया ।।३१।। लुपायें (अपनी स्थिति के अनुसार दो प्रकार की) समध्य (मध्य में लगने वाली) एवं विमध्य (मध्य से हट कर लगने वाली) होती हैं। लुपायें पाँच प्रकार की क्रमशः इस प्रकार होती हैं—मध्य, मध्यकर्ण, आकर्ण, अनुकोटिक एवं कोटि। यदि रेखा का विभाजन सम भागों में हुआ हो तो लुपा की संख्या विषम होती है एवं विषम भागों में सम संख्या में लुपायें होती हैं।।३०-३१।। कान्तान्तरासिकोष्णीषसीमन्तं स्वांशसंख्यया। चूलिका भ्रमणीया हि समयासमया च सा ।।३२।। तत्तत्सूत्रात् स्थिता दन्तस्तनसूत्राणि सूत्रयेत्। शयितसूत्रादधः पृष्ठवंशसूत्राणि सूत्रयेत् ।।३३।। कान्ता, अन्तरा, असिका, उष्णीष, सीमान्त, चूलिका, भ्रमणीया, समया एवं असमया उन सूत्रों से स्थित होकर दन्त एवं स्तन संज्ञक सूत्रों को सूत्र में बाँधती हैं (दन्त से स्तन संज्ञक सूत्र के मध्य उपर्युक्तों की स्थिति होती है)। नीचे स्थित शयित सूत्र (क्षैतिज सूत्र) पृष्ठवंश (लुपायें जिस पर टिकती हैं) को सूत्र में बाँधते हैं। शयितस्थितसूत्रान्तः कीलं तत्कूटमूर्धनि। निधायार्धेन्दुवत् सर्वाश्चूलिका विलिखेत् समाः ।।३४।। शयित सूत्र के भीतरी भाग में स्थित कील के ऊर्ध्व भाग में कूट को अर्धचन्द्र की भाँति स्थापित कर सभी सम चूलिकाओं को चिह्नित करना चाहिये।।३४।। लुपाविलुपमध्यान्तर्गता सा चूलिकाकृतिः। एवं स्याद् ऋजुकार्यं हि तथा कुक्कुटपक्षवत् ।।३५।। लुपा एवं विलुप के मध्य में भीतर स्थित चूलिका की आकृति निर्मित होती है। इस प्रकार ऋजु निर्मित होता है एवं इसकी आकृति कुक्कुट पक्षी के पंख के समान होती है।।३५।। बालकूटस्य विस्तारस्थितसूत्रस्तनान्तरे। कूटमध्यमसूत्रं तु वलयच्छिद्रमध्यगम् ।।३६।।