भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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अष्टादशोऽध्यायः 卐 प्रासादोर्ध्ववर्गाः १९७ सम चतुर्भुज बनाना चाहिये। इस चतुर्भुज के चारो भुजाओं ( सूत्रों ) की संज्ञा क, उष्णीष, आसन एवं सीम होती है॥२३॥ दण्डिकोत्तरबाहुल्यं सूत्रयेदासनादधः । आसने चतुरंशाद्याद्दशांशं बिन्दु विन्यसेत् ॥२४॥ आसन सूत्र के नीचे दण्डिका एवं उत्तर के बराबर सूत्र फैलाना चाहिये ( रेखा बनानी चाहिये )। इसके पश्चात् आसनसूत्र पर चार से प्रारम्भ कर दश भागपर्यन्त ( चार, पाँच, छः, सात, आठ, नौ, दश ) बिन्दु चिह्नित करना चाहिये॥२४॥ कोष्णीषसन्धेस्तद्विन्दु सीमच्छायाोच्चमावहेत् । छायोच्चायतमानानि कमूलादासने न्यसेत् ॥२५॥ क सूत्र एवं उष्णीष सूत्र की सन्धि से उस बिन्दु को सीम की छाया ( शिखर का एक भाग ) की ऊँचाई तक ले जाना चाहिये। छाया की ऊँचाई तक लम्बाई के मान को क सूत्र के मूल से आसनसूत्र पर न्यस्त करना चाहिये॥२५॥ तान्येव दण्डिकादीनां पर्यन्तानि भवन्ति हि। कोष्णीषसङ्गात् पर्यन्तबिन्द्वन्तं तल्लुपायतम् ॥२६॥ ये ही सूत्र दण्डिका आदि तक होते हैं। लुपाओं की लम्बाई क एवं उष्णीष सूत्र के सन्धिस्थल से बिन्दु के अन्त तक होती है॥२६॥ तत्तत्पर्यन्तविस्तारं कसूत्रे विन्यसेत् पुनः। स्वस्वकर्णगतच्छायामानैः सर्वान् विमानयेत् ॥२७॥ क सूत्र पर उनका ( लुपाओं का ) विस्तार पुनः विन्यस्त करना चाहिये ( अर्थात् लुपायें कहाँ-कहाँ लगनी हैं—इसे चिह्नित करना चाहिये )। सभी को अपने कर्ण से छायामान तक मापना चाहिये॥२७॥ तत्तत्पर्यन्तसूत्राणि मल्लपर्यन्तसूत्रवत् । एवं मध्यलुपासीम्नो वर्धन्ते वर्णसंख्यया ॥२८॥ वे पर्यन्त सूत्र मल्ल ( शिखर के एक भाग ) तक सूत्र की भाँति होते हैं। इस प्रकार मध्य में स्थित लुपा अन्य लुपाओं ( पार्श्व में स्थित लुपा ) की संख्या के अनुसार बढ़ सकते हैं॥२८॥ एवमावर्त्य तत्पश्चादारोहैर्वावरोहा च। तत्तत्पुष्करसञ्जातं तत्तन्मल्लायतं विदुः ॥२९॥ इस प्रकार ( लुपा-संयोजन ) करने से तथा आरोह एवं अवरोह से पुष्कर निर्मित