भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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१९६ मयमतम् शिखर की ऊँचाई के चौथे या पाँचवें भाग के बराबर ऊँचा कमल होना चाहिये। उसके ऊपर पद्म के बराबर अथवा उसके तीसरे भाग के बराबर लम्बी स्थूपिका ( स्तूपिका ) होती है।।१८।। अल्पीयसी शिरोर्धा वा भागोच्चा वा त्रिभागिके । सङ्क्षेपात् स्थूपिकाभूषा ह्युपरिष्टात् प्रकाश्यते ।।१९।। अत्यन्त छोटे भवन में स्थूपिका ( स्तूपिका ) का प्रमाण शिखर का आधा अथवा तीसरे भाग के बराबर होना चाहिये। इस प्रकार संक्षेप में स्थूपिका के अलङ्करणों का वर्णन ऊपर किया गया।।१९।। ✵ लुपासंख्या ✵ पञ्चाद्येकादशान्ताश्च चतुराद्या दशान्तकाः । चतुर्विधा लुपासंख्या देवेऽदेवे निकेतने ।।२०।। देवों एवं मनुष्यों के भवन में चार प्रकार के लुपाओं ( लट्ठे, लकड़ी के पट्टे ) की संख्या होती है। यह पाँच से लेकर ग्यारह पर्यन्त ( पाँच, सात, नौ, ग्यारह ) अथवा चार से लेकर दस तक ( चार, छः, आठ, दश ) होती है।।२०।। ✵ पुष्करम् ✵ पूर्वोक्तं ह्यन्तरोच्चं तु व्यामिश्रं नाम पुष्करम् । ऊर्ध्वस्थान्यप्यधस्थानि पुष्कराण्यर्धमानतः ।।२१।। पूर्व-वर्णित अन्तर की ऊँचाई व्यामिश्र नामक पुष्कर ( शिखर का एक भाग ) की है। ऊर्ध्व-स्थित एवं अधोभाग में स्थित पुष्कर का माप आधे प्रमाण से रखना चाहिये।।२१।। अर्धमारभ्य संवर्त्य पश्चादुक्तोच्चसीमयुक् । आरोहाण्यवरोहाणि गुह्यमेतदुदाहृतम् ।।२२।। आधे प्रमाण से प्रारम्भ कर सबसे ऊँचे प्रमाण तक जाना चाहिये। इसके पश्चात् वापस ( नीचे तक ) लौटना चाहिये। आरोह एवं अवरोह का यह गोपनीय क्रम इस प्रकार वर्णित है।।२२।। ✵ लुपामानम् ✵ दण्डिकावधि तारार्धं चतुरस्त्रीकृतं समम् । कोष्णीषासनसीमाख्यसूत्रयुक्तं खलं नयेत् ।।२३।। ( दो ) दण्डिकाओं के मध्य की मोटाई ( चौड़ाई ) के आधे माप के बराबर एक