भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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एकोनविंशोऽध्यायः 卐 एकभूमिविधानम् २३९ सम्पत्तियाँ प्रदान करता है। कूट, नीड, तोरण, मध्य भद्र आदि से युक्त, सभी अलङ्करणों से सुशोभित, विविध प्रकार के अधिष्ठान, स्तम्भ एवं वेदियों आदि से युक्त देवालयों का वर्णन मेरे ( मय ऋषि ) द्वारा किया गया।।४७-४९।। व्याख्यात्मक टिप्पणी १. एकभूमि-विधान ( श्लोक १-३ ) इसका वर्णन शिल्परत्न ( पूर्वभाग-३७.१-१३ ) में प्राप्त होता है। २. भवन-भेद श्लोक ( २-३ ) चार प्रकार के उत्सेध—शान्तिक, पौष्टिक, जयद एवं अद्भुत का वर्णन प्राप्त होता है। शिल्परत्न ( पू. ३७.१ ) में पाँच भेद—शान्तिक, पौष्टिक, जयद, अद्भुत एवं सार्वकामिक प्राप्त होते हैं— शान्तिकं पौष्टिक चैव जयदं त्वद्भुतं पुनः। सार्वकामिकमित्येवं पञ्चधा सदनं स्मृतम्।। ३. वेशन ( श्लोक ६ ) वेशन का वर्णन शिल्परत्न ( पू. ३९.६ ) में इस प्रकार प्राप्त होता है— हस्तं सार्धं द्विहस्तं वा प्रासादस्यांशमेव वा। अन्तरालस्य दीर्घं स्याद् द्विदण्डं तस्य वेशनम्।। ४. भित्ति की चौड़ाई ( श्लोक ८ ) इसकी तुलना शिल्परत्न ( पू. ३९.११ ) के वर्णन से की जा सकती है— प्रासादभित्तिविस्तारतुल्यं वार्थत्रिपादकम्। अन्तरालस्य भित्तेस्तु व्यासं स्यान्मण्डपे तथा।। ५. भवन के पर्याय ( श्लोक १०-१२ ) समराङ्गणसूत्रधार ( १८.८-९ ) में इस प्रकार से भवन के पर्याय प्राप्त होते हैं— आवासः सदनं सद्म निकेतो मन्दिरं मतम्। संस्थानं निधनं धिष्ण्यं भवनं वसतिः क्षयः।। अगारं संश्रयो नीडं गेहं शरणमालयः। निलयो लयनं वेश्म गृहमोकः प्रतिश्रयः।।