भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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२३८ मयमतम् विशेषेण कथोपेतं रूपाण्यपि विधानतः । एवं मूलतले प्रोक्तमुपर्युपरि वक्ष्यते ॥४३॥ उत्तर भाग में कात्यायनी एवं क्षेत्रपाल को तथा स्थानक या आसन ( खड़े अथवा बैठे ) मुद्रा में दिशामूर्तियों का विन्यास करना चाहिये। विशिष्ट कथाओं से युक्त आकृतियों का भी नियमानुसार अङ्कन करना चाहिये। इस प्रकार मूल-तल ( भूतल ) के देवता-विन्यास का वर्णन किया गया। अब ऊपरी तलों के विन्यास का वर्णन किया जा रहा है।।४२-४३।। पुरन्दरं न्यसेत् पूर्वे सुब्रह्मण्यमथापि वा। दक्षिणे वीरभद्रः स्यान्नारसिंहश्च पश्चिमे ॥४४॥ उत्तरे तु विधाता स्याद् धनदो वा विधीयते । एवं द्वितलविन्यासं त्रितले तु मरुद्गणान् ॥४५॥ तले तलेऽमरान् सिद्धान् गन्धर्वादिमुनीन् न्यसेत् । षोडश प्रतिमाश्चैव सर्वत्र परिकीर्तिताः ॥४६॥ दूसरे तल में पूर्व दिशा में पुरन्दर या सुब्रह्मण्य को, दक्षिण में वीरभद्र को, पश्चिम में नरसिंह को एवं उत्तर में विधाता या धनद को विन्यस्त करना चाहिये। तीसरे तल में मरुद्गणों का विन्यास करना चाहिये। प्रत्येक तल में देवों, सिद्धों, गन्धर्वादियों एवं मुनियों का विन्यास करना चाहिये। प्रत्येक तल में सोलह प्रतिमाओं का विन्यास होना चाहिये।।४४-४६।। ग्रीवाधस्तात् प्रतेरूर्ध्वे कोणे कोणे वृषान् न्यसेत् । सर्वेषामपि देवानां तत्तद्वाहनमीरितम् ॥४७॥ प्रदक्षिणावृतं तस्य सर्वदेवालये तथा। इत्येवमादिभिर्युक्तं विमानं सम्पदां पदम् ॥४८॥ कूटैर्नीडैस्तोरणैर्मध्यभद्रैर्युक्तायुक्तं तत्तु सर्वाङ्गशोभम् । नानाधिष्ठानाङ्घ्रिवेद्यादियोगं धाम प्रोक्तं तैतिलानां मयेह ॥४९॥ इति मयमते वास्तुशास्त्रे एकभूमिविधानं नामैकोनविंशोऽध्यायः ग्रीवा के नीचे एवं प्रति के ऊपर कोने-कोने पर वृषभों का विन्यास करना चाहिये। सभी देवों के वाहन का वर्णन किया गया है। सभी देवालयों में देवता के दक्षिण भाग में उनका विन्यास करना चाहिये। इस प्रकार सभी विशेषताओं से युक्त विमान ( मन्दिर )