मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकोनविंशोऽध्यायः 卐 एकभूमिविधानम् २३७ भवन के भेद—भवन के तीन भेद होते हैं—नागर, द्राविड एवं वेसर। सम, चतुर्भुज एवं आयताकार भवन नागर कहे गये हैं।।३५।। अष्टास्रं च षडस्रं च तत्तदायाममेव च। सौधं द्राविडमित्युक्तं वेसरं तु प्रकथ्यते ॥३६॥ वृत्तं वृत्तायतं द्व्यस्रं वृत्तं चान्यं प्रकथ्यते। आठ भुजा ( एवं कोण ) तथा छः भुजा ( एवं कोण ) वाला लम्बा भवन द्राविड़ कहा जाता है। वृत्ताकार, लम्बाई लिये वृत्ताकार, दो कोण एवं वृत्ताकार भवन वेसर कहलाता है।।३६।। स्थूप्यन्तं चतुरस्रं यन्नागरं परिकीर्तितम् ॥३७॥ ग्रीवात् प्रभृति वस्वस्रं विमानं द्राविडं भवेत्। ग्रीवात् प्रभृति वृत्तं यद् वेसरं तदुदाहृतम् ॥३८॥ स्तूपिका पर्यन्त चौकोर भवन को नागर कहते हैं। ग्रीवा से अष्टकोण विमान ( भवन, प्रासाद ) द्राविड होता है। ग्रीवा से वृत्ताकार भवन वेसर कहलाता है। ❋ विमानतलदेवता ❋ तले तले विमानानां दिक्षु देवान् न्यसेत् क्रमात्। पूर्व्वां द्वारपालौ तु नन्दिकालौ च विन्यसेत् ॥३९॥ विमान = देवालय के तलों के देवता—विमानों ( देवालयों ) के प्रत्येक तल में दिशाओं में देवताओं का क्रमशः न्यास करना चाहिये। पूर्व दिशा में नन्दी एवं काल के रूप में द्वारपाल का विन्यास करना चाहिये।।३९।। दक्षिणे दक्षिणामूर्तिं पश्चिमेऽच्युतमेव हि। अथवा लिङ्गसम्भूतमुत्तरे तु पितामहम् ॥४०॥ दक्षिण दिशा में दक्षिणामूर्ति को, पश्चिम दिशा में अच्युत को या लिङ्गसम्भूत को एवं उत्तर में पितामह को विन्यस्त करना चाहिये।।४०।। मण्डपे मध्यदेशे तु दक्षिणे तु विनायकम्। तत्पूर्वे पश्चिमे वाऽपि नृत्तरूपं विशेषतः ॥४१॥ मण्डप के मध्य भाग में दक्षिण में विनायक, एवं उनके पूर्व या पश्चिम में नृत्तरूप का विन्यास विशेष रूप से करना चाहिये।।४१।। कात्यायनीमुदग्भागे क्षेत्रपालं तथैव च। स्थानकासनसंयुक्ता दिशामूर्तीर्न्यसेद् बुधः ॥४२॥