मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३६ मयमतम् इस प्रकार देवालय के मध्य भाग के वाम भाग में प्रणाल का निर्माण करना चाहिये। अन्तःपीठ का नाल बराबर ( सतह पर ) एवं बाहर होना चाहिये।।२९।। ❋ अलङ्करणम् ❋ विस्तारायाममुत्सेधं सर्वाण्यङ्गानि च क्रमात्। संक्षेपतः समादिष्टान्यलङ्कारमथोच्यते ।।३०।। सञ्जा—प्रासाद के सभी अङ्गों का संक्षेप में क्रमशः विस्तार, लम्बाई एवं ऊँचाई का वर्णन किया गया है। अब उसके अलङ्करण का वर्णन किया जा रहा है।।३०।। वृत्तग्रीवामस्तकं वैजयन्तं श्रीभोगं स्यात् कर्णकूटोपयुक्तम् । मध्येभद्रं श्रीविशालं तदेव वस्वस्रं चेच्छीर्षकं स्वस्तिबन्धम् ।।३१।। यदि देवालय की ग्रीवा एवं मस्तक ( शीर्ष भाग ) वृत्ताकार हो तो उसकी संज्ञा 'वैजयन्त' होती है। यदि देवालय के कर्णभाग ( कोणों ) में कूट निर्मित हों तो वह 'श्रीभोग' संज्ञक होता है। यदि मध्य भाग में भद्र हो, तो वह 'श्रीविशाल' एवं शीर्षभाग यदि अष्टकोण हो तो वह 'स्वस्तिबन्ध' संज्ञक प्रासाद होता है।।३१।। वेदास्त्राभं तच्छिरः श्रीकरं स्याद् द्व्यस्रं वृत्तं हस्तिपृष्ठं हि नाम्ना । ऋत्वस्त्राभं शीर्षकं स्कन्दकान्तं तत्तन्नाम्ना तत्तदायामयुक्ते ।।३२।। चार कोण वाले शीर्ष से युक्त प्रासाद 'श्रीकर', दो कोण एवं वृत्ताकार प्रासाद 'हस्तिपृष्ठ' तथा छः कोण के शीर्ष वाला प्रासाद 'स्कन्दकान्त' संज्ञक होता है। ये सभी भवन लम्बाई लिये होते हैं।।३२।। मध्ये भद्रयुतं कर्णकूटयुक्तं तु मस्तके। कोष्ठकं भद्रनास्यङ्गं वृत्तं वा गलमस्तकम् ।।३३।। नाम्नैतत् केसरं प्रोक्तं युगास्रं वा गलं शिरः । पञ्चसप्तर्तुभागे तु त्रिद्व्यंशैर्मध्यभद्रकम् ।।३४।। केसर संज्ञक प्रासाद में मध्य भाग में भद्र एवं शीर्षभाग में कर्णकूट, कोष्ठक एवं भद्रनासी आदि अङ्ग निर्मित होते हैं। इसके गल एवं मस्तक ( छत, आच्छादन ) वृत्ताकार अथवा चतुष्कोण होते हैं। मध्य-भद्रक का प्रमाण ( भवन की चौड़ाई के ) पाँच, सात या छः भाग के तीसरे एवं दूसरे भाग के बराबर होना चाहिये।।३३-३४।। ❋ धामभेदाः ❋ नागरं द्राविडं चैव वेसरं च त्रिधा मतम् । चतुरस्रायतास्रं यन्नागरं परिकीर्तितम् ।।३५।।