मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकोनविंशोऽध्यायः 卐 एकभूमिविधानम् २३५ योग का मध्य भाग होना चाहिये तथा दूसरी ओर से भी इतनी ही दूरी रखनी चाहिये। इन दोनों (बिन्दुओं) के मध्य को विद्वानों ने भित्तिमध्य कहा है।।२२।। ❋ नालमानम् ❋ जन्मान्तं वा जगत्यन्तं कैरवान्तं गलान्तकम् ।।२३।। पट्टिकान्तं तलं पञ्चभेदं सर्वेषु धामसु। छिद्रं विद्यादधश्चोर्ध्वं बाह्ये नालं प्रयोजयेत् ।।२४।। नाली का मान—सभी भवनों में तल के पाँच भेद होते हैं—जन्म का अन्तिम भाग, जगती का अन्तिम भाग, कैरव का अन्तिम भाग, गल का अन्तिम भाग एवं पट्टिका का अन्तिम भाग। इनके निचले एवं ऊपरी भाग में छिद्र होना चाहिये एवं नाली बाहर होनी चाहिये।।२३-२४।। द्वादशाङ्गुलमारभ्य त्रित्र्यङ्गुलविवर्धनात्। चतुर्विंशाङ्गुलं यावदायामं पञ्चधा भवेत् ।।२५।। बारह अङ्गुल से प्रारम्भ करते हुये तीन-तीन अङ्गुल की वृद्धि से चौबीस अङ्गुल- पर्यन्त पाँच प्रकार की नाली की लम्बाई होती है।।२५।। अष्टाङ्गुलं समारभ्य द्विद्व्यङ्गुलविवर्धनात्। तारं षोडशमात्रान्तं पञ्चधा परिकीर्तितम् ।।२६।। आठ अङ्गुल से प्रारम्भ कर दो-दो अङ्गुल बढ़ाते हुये सोलह अङ्गुलपर्यन्त पाँच प्रकार की नाली की चौड़ाई होती है।।२६।। समं त्रिपादमर्धं वा घनं छिद्रं तु मध्यमे। त्रिचतुष्पञ्चषण्मात्रं तारं तत्समनिम्नकम् ।।२७।। इनकी मोटाई (गहराई) चौड़ाई के बराबर, तीन चौथाई या आधी होनी चाहिये। मध्यम माप तीन, चार, पाँच या छः अङ्गुल चौड़ा एवं उतना ही गहरा होता है।।२७।। मूलात् पञ्चत्रिभागं स्यादग्रं धारासमन्वितम्। घटितं सिंहवक्त्रेण किञ्चिन्मूलान्नताग्रकम् ।।२८।। नाली के अग्र भाग (दूसरे छोर) की चौड़ाई मूल भाग के पाँच भाग में से तीन भाग के बराबर एवं धारा से युक्त होनी चाहिये। इसका अग्र भाग मूल भाग से कुछ नीचा (ढालदार) एवं सिंह के मुख से युक्त होता है।।२८।। एवं नालं प्रकर्तव्यं वामे प्रासादमध्यमे। अन्तःपीठस्य नालस्य समं वा बहिरिष्यते ।।२९।।