भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

पृष्ठ 265, कुल 395 में से

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विंशोऽध्यायः 卐 द्विभूमिविधानम् २४१ ( स्वस्तिक देवालय का ) अधिष्ठान चतुर्भुज होता है एवं कन्धर तथा मस्तक ( शीर्षभाग ) भी उसी प्रकार होता है। यह चार कूटों एवं चार कोष्ठों ( मध्य-कूट ) से युक्त होता है।।६।। दध्रनीडानुपर्यष्टौ षडष्टैवाल्पनासिकम् । शिखरं चोरुनीडाभिर्वेदसङ्ख्याभिरन्वितम् ।।७।। ऊपरी भाग में आठ दध्रनीड ( सजावटी खिड़कियाँ ) तथा अड़तालीस अल्प- नासिक ( अत्यन्त छोटे अलङ्करण-विशेष ) होते हैं। शिखरभाग में चार बड़े आकार के नीड ( सजावटी खिड़कियाँ ) होते हैं।।७।। हारान्तरस्य मध्ये तु कुड्यं कुम्भलतान्वितम् । तोरणैर्वेदिकाद्यैस्तु नानाचित्रैर्विचित्रितम् ।।८।। सर्वदेवार्हकं शस्तं नाम्नैतत् स्वस्तिकं भवेत् । हार ( चारो ओर निर्मित गलियारा ) के मध्य भाग में भित्ति पर कुम्भ से निर्गत लतायें निर्मित होती हैं तथा तोरण, वेदिका एवं विभिन्न प्रकार के अङ्कनों से भवन सुसज्जित रहता है। यह भवन सभी देवों के अनुकूल होता है एवं इसका नाम स्वस्तिक होता है।।८।। ✺ विपुलसुन्दरम् ✺ तदेव सौष्ठिकं निम्नमुन्नतं कोष्ठकं यदि ।।९।। अन्तरप्रस्तरोपेतमेतद् विपुलसुन्दरम् । यदि देवालय के सौष्ठिक ( कर्णकूट ) नीचे हों एवं कोष्ठक ( मध्य-कूट ) ऊँचा हो तथा अन्तर प्रस्तर से युक्त हो तो उसे 'विपुलसुन्दर' कहते हैं।।९।। ✺ कूटलक्षणम् ✺ अंशमंशत्रयं सत्रिपादांशं साङ्घ्रिभागिकम् ।।१०।। भागत्रयं वितर्द्यङ्घ्रिप्रस्तरग्रीवमस्तकम् । पादोदये दशांशे तु द्वितलादिविमानके ।।११।। अन्तरप्रस्तरोपेतं कूटशालोन्नतं मतम् । कूट का लक्षण—द्वितल आदि वाले विमान ( देवालय ) में पादोदय ( पूरे देवालय ) के दश भाग होने चाहिये। एक भाग से वितर्दि, तीन भाग से अङ्घ्रि, पौने दो भाग से प्रस्तर, सवा भाग से ग्रीव तथा तीन भाग से मस्तक निर्मित होना चाहिये। अन्तर प्रस्तर से युक्त ऊँचे भवन को 'कूटशाल' कहते हैं।।१०-११।। मय०-१६

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