मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४२ मयमतम् ✹ कैलासादि ✹ तदेव कोष्ठकं निम्नं सौष्ठिकं चोन्नतं यदि ॥१२॥ अन्तरप्रस्तरोपेतमेतत् कैलासमुच्यते । यदि कोष्ठक नीचा हो एवं सौष्ठिक ऊँचा हो तथा अन्तर-प्रस्तर से युक्त हो तो उस भवन ( देवालय ) को कैलास कहते हैं ॥१२॥ तदेव वर्तुलं वेदिकन्धरं शिखरं घटम् ॥१३॥ अष्टकूटं चतुश्शालोपेतं सप्ताष्टनासिकम् । कोष्ठकान्निर्गमं मध्ये द्वित्रिदण्डेन सौष्ठिकात् ॥१४॥ समग्रीवाशिरोयुक्तं कूटकोष्ठकमीरितम् । नानाधिष्ठानसंयुक्तं नानापादैरलङ्कृतम् ॥१५॥ नाम्नैतत् पर्वतं प्रोक्तं विमानं सार्वदेशिकम् । यदि वेदी, कन्धर, शिखर एवं घट वर्तुलाकार हों, आठ कूट हों, चार शाल से युक्त हों, छप्पन नासिक ( सजावटी खिड़कियों की आकृतियाँ ) हों, कोष्ठक ( मध्य कूट ) से प्रारम्भ हुये दो या तीन दण्ड के निर्गम सौष्ठिक से सम्बद्ध होते हैं। समान माप वाले ग्रीवा एवं शीर्षभाग से युक्त कूट-कोष्ठ होते हैं। विविध प्रकार के अधिष्ठान से युक्त एवं विविध प्रकार के स्तम्भों से सुसज्जित विमान की संज्ञा ‘पर्वत’ होती है एवं यह सभी के अनुकूल होती है ॥१३-१५॥ तदेव शिखरे चार्धकोष्ठकं तु चतुष्टयम् ॥१६॥ चतुरश्रशिरोयुक्तं चतुष्कूटसमन्वितम् । नानाधिष्ठानसंयुक्तं षडष्टैवाल्पनासिकम् ॥१७॥ नाम्नैतत् स्वस्तिबन्धं स्यान्नानावयवशोभितम् । देवालय के शिखर पर चार अर्धकोष्ठ हों, इनका शिरोभाग चौकोर हो एवं चार कूटों से युक्त हो, अनेक प्रकार के अधिष्ठान से युक्त हों एवं अड़तालीस अल्पनासिक हों, तो उसकी संज्ञा ‘स्वस्तिबन्ध’ होती है एवं यह विभिन्न अङ्गों से सुसज्जित होता है ॥१६-१७॥ तदेव सौष्ठिकं कोष्ठमन्तरप्रस्तरैर्युतम् ॥१८॥ हारालपपञ्जरं निम्नं नवाष्टैर्वाल्पनासिकम् । नानालङ्कारसंयुक्तं कल्याणमिति पठ्यते ॥१९॥ यदि कोणों एवं मध्य में अन्तर-प्रस्तर से युक्त कोष्ठ हों, हारा ( गलियारा ) एवं