भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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२४४ मयमतम् सर्वालङ्कारसंयुक्तमेतन्नाम्ना मनोहरम् । यदि देवालय का अधिष्ठान चौकोर हो एवं गर्भगृह वृत्ताकार हो तथा भवन सभी अलङ्करणों से युक्त हो तो उसकी संज्ञा 'मनोहर' होती है।।२६।। तदेव जन्माद्य कुम्भाद् वृत्तं चेति बहिर्बहिः ॥२७॥ शेषं पूर्ववदुद्दिष्टमिष्टमीश्वरकान्तकम् । यदि जन्म ( भवन के मूल ) से लेकर कुम्भ ( शिखर भाग ) तक देवालय बाहर एवं भीतर से वृत्ताकार हो एवं शेष भाग पूर्ववर्णित विधि के अनुसार हो तो उसे 'ईश्वरकान्त' कहते हैं।।२७।। तदेव चतुरस्रं स्याद् गर्भगेहं मसूरकम् ॥२८॥ वर्तुलं जन्मतः स्थूपिकान्तं चेद् वृत्तहर्म्यकम् । यदि देवालय का गर्भगृह चौकोर हो, अधिष्ठान गोलाकार हो तथा जन्म से लेकर स्तूपिकापर्यन्त भवन वृत्ताकार हो तो उसे 'वृत्तहर्म्य' कहते हैं।।२८।। आयतास्रमधिष्ठानं षडस्रं कन्धरं शिरः ॥२९॥ तदेव पूर्ववत् सर्वं नाम्ना कुबेरकान्तकम् । यदि अधिष्ठान चौकोर हो तथा कन्धर एवं शिर षट्कोण हों एवं शेष सभी भाग पूर्ववत् हों तो उस देवालय की संज्ञा 'कुबेरकान्त' होती है।।२९।। मानं पञ्चविधं धाम्नां भेदं पञ्चदशैव हि ॥३०॥ द्वितलानां यथा प्रोक्तं तथा कुर्याद् विचक्षणः । दो तल वाले भवनों के प्रमाण पाँच प्रकार के होते हैं एवं उनके भेद पन्द्रह होते हैं। बुद्धिमान ( स्थपति ) को भवन का निर्माण उसी प्रकार करना चाहिये, जिस प्रकार उनका वर्णन किया गया है।।३०।। ❋ पुनः धामभेदाः ❋ सञ्चितासञ्चितं चैवोपसञ्चितमिति त्रिधा ॥३१॥ पुनः भवन के भेद—सञ्चित, असञ्चित एवं उपसञ्चित संज्ञक भवन के तीन भेद होते हैं।।३१।। स्त्रीपुंनपुंसकं चैव त्रिविधं तत् प्रवक्ष्यते । इष्टकाभिः शिलाभिर्वा सञ्चितं यद् घनीकृतम् ॥३२॥ उपर्युक्त भेदों को स्त्री, पुरुष एवं नपुंसक कहते हैं। ईंटों अथवा शिलाओं से निर्मित भवन 'सञ्चित' होता है।।३२।।