मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविंशोऽध्यायः 卐 द्विभूविधानम् २४५ कपोतादिशिरोयुक्तं तत्तुं पुंस्त्वं समीरितम् । ऐष्टकं दारुजं सौधं भोगयुक्तागसंयुक्तम् ॥३३॥ स्त्रीत्वं ह्यसञ्चितं भोगाभोगयुक्तं द्रुमेष्टकैः । घनाघनाङ्गयुक् षण्डमुपसञ्चितमिष्यते ॥३४॥ कपोत आदि जिस भवन के शीर्षभाग पर हों, उसे पुरुष भवन कहते हैं। ईंटों या काष्ठ से निर्मित, भोग एवं आग (शिरोभाग के विशिष्ट निर्माण) से युक्त भवन स्त्रीत्वयुक्त 'असञ्चित' संज्ञक होते हैं। काष्ठ अथवा ईंटों से निर्मित भोग एवं अभोग से युक्त तथा घन एवं अघन अङ्गों से युक्त भवन नपुंसक होता है। इसकी संज्ञा 'उपसञ्चित' होती है।।३३-३४।। ✺ खण्डभवनम् ✺ ऊर्ध्वतलपादनिजदैर्घ्यमुनिभागे स्थूप्युदयमेकमथ कं प्रति गुणांशम् । द्व्यंशि गलमंशकवितर्दिकमधस्तात् खण्डभवनस्य विधिरुक्तमुरुधीभिः ॥३५॥ मनीषियों के अनुसार खण्डभवन की स्थूपी (स्तूपिका) का मान ऊपरी तल के स्तम्भ के सातवें भाग के बराबर होता है। छत की ऊँचाई (स्तम्भ के सात भाग) के तीन भाग के बराबर, गल दो भाग के बराबर एवं वितर्दिक (गल का आधार) एक भाग के बराबर होता है।।३५।। ✺ तोरणम् ✺ पादोदये दशनवाष्टविभाजिते तत् सप्तर्तुपञ्चचरणायतमत्र भागम् । शेषं झषांशमुदयार्धविशालकं वा षट्पञ्चवेदचरणेन भवेद्विशालम् ॥३६॥ तोरण की ऊँचाई के लिये स्तम्भ के दश, नौ या आठ भाग करने चाहिये। उनमें क्रमशः सातवें, छठे या पाँचवें भाग को ग्रहण करना चाहिये। शेष भाग से झषांश (मछली की आकृति के सदृश गोलाई लिये पट्टिका) निर्मित करना चाहिये। इसकी चौड़ाई लम्बाई की आधी, छठवें भाग, पाँचवें भाग अथवा चौथे भाग के बराबर रखनी चाहिये।।३६।। नीडस्य तावदुदयं च विशालमङ्घ्रे- र्मूलात् त्रिपादविपुलं तलिपं तयोश्च।