भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

पृष्ठ 270, कुल 395 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 270

२४६ मयमतम् हारान्तरे सदनमध्यपदे च कूटे कोष्ठे च तोरणमलङ्कृतमेव कुर्यात् ॥३७॥ नीड (सजावटी खिड़की की आकृति) की चौड़ाई उसकी ऊँचाई के बराबर होनी चाहिये। उन दोनों (तोरण एवं नीड) की परिधि स्तम्भ के मूल भाग के तीन चौथाई के बराबर होनी चाहिये। हार के मध्य, भवन-मध्य, कूट पर एवं कोष्ठ पर तोरण से अलङ्करण करना चाहिये॥३७॥ द्वारस्योभयपार्श्वे द्वारसमीपे तु वाथ पदमध्ये। द्वारपवासगुहा स्यादुत्तरमण्डान्तकं तु वोच्चं तत् ॥३८॥ खण्डान्तपोतिकान्तं तोरणमात्रोदयं तु वा कथितम्। युक्त्या प्रवेशयुक्त्या सर्वस्मिन् धाम्नि कर्तव्याः ॥३९॥ इति मयमते वस्तुशास्त्रे द्विभूमिविधानं नाम विंशोऽध्यायः द्वार के रक्षक का कक्ष द्वार के दोनों पार्श्वों में, द्वार के समीप अथवा पद के मध्य में होना चाहिये। इसकी ऊँचाई उत्तरमण्डपर्यन्त, खण्डपर्यन्त, पोतिकापर्यन्त अथवा तोरणपर्यन्त कही गई है। सभी भवनों में उचित रीति से प्रवेश-भाग का निर्माण युक्ति- पूर्वक करना चाहिये॥३८-३९॥ व्याख्यात्मक टिप्पणी १. द्विभूमि-विधान शिल्परत्न (पूर्व.-३७.१३-१७) में विस्तार से प्राप्त होता है। २. कुम्भलता कुम्भलता (श्लोक ८) का वर्णन शिल्परत्न (पूर्व. २८ अ.) में प्राप्त होता है— स्तम्भान्तरे महति धामनि पादविस्तारोच्चाधिपादततपद्मगकुम्भसंस्थाम्। पादायतां घटमुखोद्गतपत्रचित्रमूलां प्रकल्पयतु कुम्भलतां समन्तात्।।१।। ∗</p> विनिर्गतोन्नतिं कुम्भं पार्श्वयोस्तस्य तन्मुखात्। पत्रैर्विनिर्गतैश्चित्रं यथाशोभं नियोजयेत्।।३।।