भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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अथैकविंशोऽध्यायः ( त्रिभूमिविधानम् ) त्रितलं पञ्चधामानं संक्षेपाद् वक्ष्यतेऽधुना। सप्ताष्टहस्तमारभ्य द्विद्विहस्तविवर्धनात् ।।१।। पञ्चदशविकारान्तं व्यासं तुङ्गं तु पूर्ववत्। तीन तल वाले भवन का विधान—तीन तल वाले भवन के पाँच प्रकार के प्रमाण को अब संक्षेप में वर्णित किया जा रहा है। सात या आठ हाथ से प्रारम्भ कर पन्द्रह या सोलह हाथपर्यन्त दो-दो हाथ की क्रमशः वृद्धि करते हुये इसे ले जाना चाहिये। यह इनका व्यास है। ऊँचाई पूर्ववर्णित नियम के अनुसार होनी चाहिये।।१।। ✵ स्वस्तिकम् ✵ सप्ताष्टानन्दहस्ते तु सप्ताष्टांशैर्विभाजिते ।।२।। भागेन कूटविस्तारं कोष्ठद्वित्रिगुणायतम् । लम्बपञ्जरमर्धांशं हाराभागं तु तत्समम् ।।३।। यदि ( भूतल की चौड़ाई ) सात, आठ या नौ हाथ हो तो उसके सात या आठ भाग करने चाहिये। इसके एक भाग से कूट की चौड़ाई, दो या तीन भाग से कोष्ठ ( मध्य में स्थित कोष्ठ या कूट ) की चौड़ाई, आधे भाग से लम्ब पञ्जर ( हारा संज्ञक मार्ग के ऊपर लटकती आकृति ) एवं इसी के बराबर प्रमाण का हारा संज्ञक मार्ग या गलियारा होना चाहिये।।२-३।। ऊर्ध्वभूमौ षडंशेंऽशं कूटं तद्द्विगुणायतम् । कोष्ठकं चान्तरे हारं भागेनैव प्रकल्पयेत् ।।४।। ऊपरी तल ( द्वितीय तल ) के छः भाग करना चाहिये। एक भाग से कूट एवं उसका दुगुना चौड़ा कोष्ठक एवं मध्य में एक भाग से हारा का निर्माण करना चाहिये।।४।। ऊर्ध्वभूमौ त्रिभागेन मध्ये भद्रं विधीयते । दण्डं सार्धं द्विदण्डं वा भद्रं तत् कारयेद् बुधः ।।५।।