मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५० मयमतम् देवालय की चौड़ाई के सात या नौ भाग करने पर सौष्ठिक ( कोण के कोष्ठों ) को एक भाग चौड़ा, शाला ( मध्य का लम्बा कोष्ठ ) एक या दो भाग चौड़ा तथा हारा-मार्ग को एक भाग से निर्मित करना चाहिये ।।११।। अष्टकूटं तु तत्कोष्ठं द्वादशैव विधीयते । अष्टौ नीडानि विंशत्तु शतमत्रल्पनासिकम् ॥१२॥ ( इस देवालय में ) आठ कूट, बारह कोष्ठ, आठ नीड तथा एक सौ बीस अल्पनासिक होना चाहिये ।।१२।। अष्टास्रं मस्तकं वेदी कन्धरं चाष्टनासिकम् । विमलाकृतिकं नाम्ना शम्भोर्वासं सनातनम् ॥१३॥ मस्तक, वेदी एवं कन्धर अष्टकोण एवं आठ नासिक होना चाहिये। 'विमलाकृतिक' नामक यह देवालय भगवान् शिव के निवासयोग्य होता है ।।१३।। हस्तनवसप्तततिसप्तनवभागं भागततिकूटवसुकं तु रविकोष्ठम् । ऊर्ध्ववसुपञ्जरमथाष्टगलनासं विंशतिशतानु विमलाकृति विमानम् ॥१४॥ जब चौड़ाई सात या नौ हाथ हो तो उसके सात या नौ भाग करने चाहिये। कूट की चौड़ाई एक भाग हो एवं इनकी संख्या आठ हो। बारह कोष्ठ हों, आठ ऊर्ध्वपञ्जर हों, आठ गलनास हों तथा एक सौ बीस ( सजावटी आकृति हों ) तो उस विमान ( देवालय ) की संज्ञा 'विमलाकृति' होती है ।।१४।। ❋ हस्तिपृष्ठम् ❋ एकादशकरं व्यासमष्टभागैर्विभाजयेत् । तच्चतुर्भागमाधिक्यमायतं वृत्तमिष्यते ॥१५॥ ग्यारह हाथ के विस्तार को आठ भाग में विभक्त करना चाहिये। लम्बाई को विस्तार से चार भाग अधिक रखना चाहिये तथा ( एक ओर ) वृत्ताकार ( एवं एक ओर दो कोण ) होना चाहिये।।१५।। द्व्यस्रवृत्तमधिष्ठानं तद्वत् कन्धरमस्तकम् । तद्विस्तारार्धमानेन वर्तुलं वर्तनीयकम् ॥१६॥ अधिष्ठान दो कोण ( एक सिरे पर एवं दूसरे सिरे पर ) वृत्ताकार होना चाहिये। इसी प्रकार कन्धर एवं मस्तक ( शिखर ) होना चाहिये। विस्तार के आधे प्रमाण से वृत्ताकृति निर्मित करना चाहिये।।१६।।