भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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एकविंशोऽध्यायः 卐 त्रिभूमिविधानम् २५१ अस्त्रात् पार्श्वे च पृष्ठं च कुर्यादर्कद्वयांशकम्। कूटकोष्ठकनीडानां विस्तारं भागमिष्यते ॥१७॥ कोष्ठकं द्विगुणायामं हारा भागेन योजिता। कोण ( एवं भुजा ) के बगल एवं पृष्ठ भाग के बारह भाग दो बार करना चाहिये। कूट, कोष्ठक एवं नीड के विस्तार का निर्माण एक भाग से करना चाहिये। कोष्ठक को दुगुना लम्बा तथा हारामार्ग ( की चौड़ाई ) एक भाग से निर्मित करनी चाहिये॥१७॥ ⁕ मुखमण्डपम् ⁕ समं त्रिपादमर्धं वा मुखमण्डपमिष्यते ॥१८॥ मण्डपोर्ध्वं यथा हर्म्यं तथालङ्कारमीरितम्। कूटकोष्ठादिसंयुक्तं मण्डपं सर्वहर्म्यके ॥१९॥ मुख-मण्डप का प्रमाण भवन के बराबर, तीन चौथाई या आधा होना चाहिये। मण्डप के ऊपर उसी प्रकार का अलङ्करण होना चाहिये, जिस प्रकार भवन के ऊपर होता है। सभी भवनों ( देवालयों ) में मण्डप को कूट एवं कोष्ठ आदि से युक्त निर्मित करना चाहिये॥१८-१९॥ त्रिवर्गसहितं वाऽपि तोरणाद्यैर्विचित्रितम्। मण्डपं समसूत्रं चेदन्तरालं तु निम्नकम् ॥२०॥ अथवा त्रिवर्गसहित भवन ( अर्थात् कूट आदि से रहित तीन वर्ग वाले भवन ) को तोरण आदि से सजाना चाहिये। यदि मण्डप प्रधान भवन के बराबर हो तो अन्तराल नीचा होना चाहिये॥२०॥ कूटकोष्ठादि सर्वाङ्गं मानसूत्राद् बहिर्गतम्। स्वव्यासार्धं तदर्धार्थं दण्डं सार्धद्विदण्डकम् ॥२१॥ द्विदण्डार्धं त्रिदण्डं वा मानसूत्राद् बहिर्गतम्। एवं युञ्जीत हर्म्यं तु सम्पदामास्पदं सदा ॥२२॥ ऋजुसूत्रं प्रमाणान्तं तद्भङ्गं विपदां पदम्। कूट एवं कोष्ठ आदि सभी अवयव मान-सूत्र से बाहर की ओर निकले होते हैं। ये भाग अपने चौड़ाई के आधे अथवा उसके आधे, एक दण्ड, डेढ़ दण्ड, ढाई दण्ड, तीन दण्डपर्यन्त मानसूत्र से बाहर निकले होते हैं। जिस भवन में इस विधि से कूटादि अङ्गों का निर्माण होता है, वह सदैव सम्पत्ति प्रदान करता है। एक सीधी रेखा ( ऋजु सूत्र ) से इसका प्रमाण लेना चाहिये। ऋजुसूत्र का टूटना विपत्ति प्रदान करता है।