भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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२५२ मयमतम् ✵ पुनः हस्तिपृष्ठम् ✵ षड्भागं स्यात्तदूर्ध्वं तु पृष्ठतस्तस्य पार्श्वयोः ॥२३॥ कृत्वार्कद्विगुणांशं तु कूटकोष्ठादि पूर्ववत् । ऊर्ध्वभौमं चतुर्भागं यथायुक्तिवशान्नयेत् ॥२४॥ ऊर्ध्व-तल ( की चौड़ाई ) को छः भाग में बाँटना चाहिये। उसके पृष्ठ-भाग के दोनों पार्श्वों को बारह-बारह भाग में बाँटना चाहिये। ऊपरी तल के चार भाग करने चाहिये। चौकोर भाग पर पहले के समान यथोचित रीति से कूट एवं कोष्ठ आदि का निर्माण करना चाहिये॥२३-२४॥ मस्तके पुरतो नेत्रशालावक्त्रसमन्वितम् । गर्भकूटोपसम्पन्नं क्षुद्रनास्यङ्घ्रिसंयुतम् ॥२५॥ भवन के शीर्ष भाग में सामने की ओर नेत्रशाला ( नेत्र के आकार का प्रकोष्ठ ) एवं वक्त्र ( मुखभाग ) निर्मित करना चाहिये तथा क्षुद्रनासी एवं स्तम्भ से युक्त गर्भगूट का निर्माण करना चाहिये॥२५॥ कूटकोष्ठादिसंयुक्तं यथालङ्कारमाचरेत् । शिखरे दश नास्यः स्युस्तिस्रः पादसमन्विताः ॥२६॥ कूट एवं कोष्ठ आदि का निर्माण इस प्रकार करना चाहिये, जिससे भवन सुन्दर लगे। शिखर भाग पर तीस नासिकायें निर्मित होनी चाहिये॥२६॥ अष्टकूटं तथा कोष्ठं नीडं द्वादश चैव हि । हारायां क्षुद्रनीडं स्यादर्कद्विगुणसंख्यया ॥२७॥ भवन पर आठ कूट एवं आठ कोष्ठ तथा बारह नीड होना चाहिये। हारा-मार्ग पर बारह क्षुद्रनीडों का निर्माण होना चाहिये॥२७॥ नानामसूरकस्तम्भवेदिकाद्यैरलङ्कृतम् । सोपपीठमधिष्ठानं केवलं वा मसूरकम् ॥२८॥ हस्तिपृष्ठमिदं नाम्ना सर्वदेवेषु योग्यकम् । विभिन्न प्रकार के मसूरक ( अधिष्ठान ), स्तम्भ एवं वेदिका आदि से भवन को अलङ्कृत करना चाहिये। अधिष्ठान उपपीठ से युक्त हो अथवा केवल अधिष्ठान हो। यह 'हस्तिपृष्ठ' नामक भवन सभी देवों के लिये अनुकूल होता है॥२८॥ ✵ स्तम्भतोरणम् ✵ पादोच्चत्रिद्विभागोच्चं पादं सर्वाङ्गसंयुतम् ॥२९॥