भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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एकविंशोऽध्यायः 卐 त्रिभूमिविधानम् २५३ पोतिकारहितं वीरकाण्डोपरि समण्डितम्। उत्तरं वाजनं साब्जक्षेपणं निम्नवाजनम् ॥३०॥ स्तम्भ की ऊँचाई के दो तिहाई भाग के बराबर (स्तम्भतोरण) की ऊँचाई रखनी चाहिये एवं इसके सभी अङ्गों का निर्माण करना चाहिये। इसे पोतिकाविहीन तथा वीरकाण्ड के ऊपर मण्डि से युक्त, उत्तर-वाजन, अब्ज-क्षेपण (पट्टिका पर निर्मित पद्मपुष्प) एवं निम्न-वाजन से युक्त निर्मित करना चाहिये।।२९-३०।। तदूर्ध्वे झषकाण्डं स्यान्नानापत्रैर्विचित्रितम्। तोरणाकृतिसंयुक्तं मृणाल्यन्वितकन्धरम् ॥३१॥ सर्वालङ्कारसंयुक्तं स्तम्भतोरणमीरितम्। उसके ऊपर झष-काण्ड (मछली की आकृति वाली गोलाई-युक्त पट्टिका) विभिन्न प्रकार के पत्रों से सुसज्जित होना चाहिये। इसे तोरण की आकृति से युक्त एवं कन्धर पर कमल की नाल अङ्कित होनी चाहिये। सभी अलङ्करणों से युक्त 'स्तम्भतोरण' का वर्णन किया गया है॥३१॥ पादान्तरे वा हारायां कर्णप्रासादमध्यमे। शालामध्येऽन्तराले तु कुर्यात् सर्वेषु धामसु ॥३२॥ दो स्तम्भों के मध्य में, हारा-मार्ग पर, कर्ण-प्रासाद के मध्य भाग में, शाला (कोष्ठ) के मध्य के अन्तराल पर सभी भवनों में (स्तम्भ-तोरण का प्रयोग करना चाहिये)॥३२॥ स्तम्भे सर्वाङ्गयुक्ते समतलमुभयोः पार्श्वयोर्वीरकाण्ड- स्याग्रे न्यस्तोत्तरं वाजनमुपरि दलं क्षेपणं तोरणाग्रम्। नक्रैः पत्रादिभिर्यद् विरचितमथ तद् धाम्नि वा मण्डपे वा शालायामन्यवस्तुष्वभिमतमयुतस्तम्भयुक् तोरणं स्यात् ॥३३॥ सभी अवयवों से युक्त दोनों पाश्यों में स्थित स्तम्भ का तल (ऊँचाई) समान होना चाहिये। वीर-काण्ड अग्र भाग में उत्तर एवं वाजन की स्थापना करनी चाहिये। वाजन के ऊपर दल (पुष्प-पत्र आदि) एवं क्षेपण की स्थापना करनी चाहिये। तोरण के अग्र भाग में नक्र (मकर) एवं पत्र आदि की रचना करनी चाहिये। इस प्रकार के तोरण की देवालय, मण्डप, भवन या अन्य भवन में स्थापना करनी चाहिये। इसमें स्तम्भ की संख्या अयुत (एक) होनी चाहिये।।३३।। ✺ पुनः हस्तिपृष्ठम् ✺ तदेव चतुरस्राभमायतं तन्मसूरकम् ॥३४॥