मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५४ मयमतम् विस्तारमष्टभागं स्यादायामं दशभागभाक् । कूटकोष्ठकनीडं च भागेन परिकल्पयेत् ।। ३५ ।। जब मसूरक ( अधिष्ठान ) आयताकार हो तो उसकी चौड़ाई के आठ भाग एवं लम्बाई के दस भाग करने चाहिये। कूट, कोष्ठक एवं नीड की संरचना एक-एक भाग से करनी चाहिये।। ३४-३५ ।। हाराभागं तु भागेन षडंशं चोर्ध्वभूमिके । तदूर्ध्वे तु चतुर्भागमायामे द्वयंशमाधिकम् ।। ३६ ।। एक भाग से हारा-मार्ग बनाना चाहिये। इसके ऊपर के तल की चौड़ाई के छः भाग होने चाहिये तथा लम्बाई को दो भाग अधिक रखना चाहिये एवं उसके चार भाग करने चाहिये।। ३६ ।। सायतं द्व्यस्रवृत्तं स्याद् वेदिकागलमस्तकम् । कूटकोष्ठादि सर्वाङ्गं पूर्ववत् परिकल्पयेत् ।। ३७ ।। वेदिका, गल एवं मस्तक आयताकार; किन्तु दो कोण वाला वृत्ताकर ( आयताकार आकृति के एक सिरे पर दो कोण हों एवं दूसरा सिरा गोलाई लिये हो ) होना चाहिये। कूट एवं कोष्ठ आदि सभी अङ्गों को पूर्ववर्णित रीति से निर्मित करना चाहिये।। ३७ ।। नानाधिष्ठानसंयुक्तं नानापादैरलङ्कृतम् । पादोपरि भवेन्नासी स्वस्तिबन्धनशोभिता ।। ३८ ।। यथा बलं यथा योगं तथा कुर्याद् विचक्षणः । एतदप्युदितं सौधं गजपृष्ठं पुरातनैः ।। ३९ ।। युग्मेऽप्येवं प्रयुञ्जीयात् सर्वहर्म्यं विचक्षणः । विविध प्रकार के अधिष्ठानों से एवं विभिन्न प्रकार के स्तम्भों से अलङ्कृत होना चाहिये। स्तम्भों के ऊपर स्वस्तिबन्धन से सुशोभित नासी ( सजावटी खिड़की ) होनी चाहिये। बुद्धिमान व्यक्ति को बल के अनुरूप एवं यथोचित रीति से भवन का निर्माण करना चाहिये। प्राचीन मनीषियों ने इस भवन ( देवालय ) को भी 'गजपृष्ठ' कहा है। सभी देवालयों में सम संख्या का प्रयोग प्रमाण के लिये करना चाहिये।। ३८-३९ ।। ❋ भद्रकोष्ठम् ❋ त्रयोदशकरव्यासं नवधा विभजेत् समम् ।। ४० ।। गर्भगेहं त्रिभागेन गृहपिण्डस्तु भागतः । अन्धारमंशमंशेन परितोऽन्धारिका भवेत् ।। ४१ ।।