मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५८ मयमतम् अनुसार हों तो उस देवालय की संज्ञा 'श्रीभोग' होती है।।६०।। ✸ कूटकोष्ठादि ✸ वृत्ते वृत्तायते द्व्यस्रवृत्तेऽष्टास्रे षडस्रके । कूटकोष्ठकनीडानामुपर्युपरि च क्रमात् ।।६१।। कूटकोष्ठकनीडैश्च मण्डितं खण्डहर्म्यके । वृत्ताकार, वृत्तायताकार ( लम्बाई-युक्त गोलाई ), दो कोण वाले ( एवं दूसरे सिरे पर ) वृत्ताकार, आठ कोण एवं छः कोण वाले भवन में प्रत्येक तल में कूट, कोष्ठक एवं नीड होना चाहिये। इनके ऊपर खण्ड-हर्म्यक ( लम्बी सजावटी कक्ष की आकृति ) भी हो, जो कूट, कोष्ठ तथा नीडों से सुसज्जित हो।।६१।। ऋजुभागविशालात्तु द्व्यस्रवृत्ते तु वर्तुले ।।६२।। भागं किञ्चिद् भवेन्न्यूनं भागं सर्वं समं तु वा । अष्टांशोनदशांशोनमूर्ध्वांशं वाऽप्यधोंऽशकात् ।।६३।। यथा शोभाबलावाप्तिस्तथा युञ्जीत बुद्धिमान् । दो कोण वाले वृत्ताकार एवं वर्तुलाकार भवन में भीतरी भाग में सीधे भाग से कुछ कम हो सकता है या बराबर माप हो सकता है। ऊपरी तल निचले तल से आठ या दश भाग कम हो सकता है। जिस रीति से भवन सुन्दर लगे एवं दृढ़ हो, उस रीति का प्रयोग बुद्धिमान स्थपति को करना चाहिये।।६२-६३।। ✸ पुनः धामभेदाः ✸ अर्पितानर्पितं चैव प्रासादं द्विविधं भवेत् ।।६४।। अर्पितं न च सालिन्द्रमनर्पितमलिन्द्रभाक् । एवमल्पक्रमं सर्वं योजयेत्तद् विचक्षणः ।।६५।। पुनः भवन के भेद—देवालय दो प्रकार के होते हैं—अर्पित एवं अनर्पित। अर्पित देवालय में अलिन्द नहीं होता है एवं अनर्पित में अलिन्द होता है। इस अल्प- क्रम का प्रयोग सभी देवालयों में बुद्धिमान स्थपति को करना चाहिये।।६०-६५।। ✸ नालीगृहम् ✸ गुणशरमुनिनन्दैकादशैकाधिकार्कै- स्तिथिमुनिदशभागे हर्म्यतारे कृतेऽस्मिन् । शशिगुणयुगबाणैः षड्यमी नागनन्दैः स्वभवनविपुलस्यार्धेन नालीगृहं स्यात् ।।६६।।