भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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एकविंशोऽध्यायः 卐 त्रिभूमिविधानम् २५९ गर्भगृह—गर्भगृह अथवा नाली-गृह का प्रमाण देवालय का तीसरा भाग, पाँच भाग में तीन भाग, सात में चार भाग, नौ में पाँच भाग, ग्यारह में छः भाग, तेरह में सात भाग, पन्द्रह में आठ भाग, सत्रह में नौ भाग अथवा मन्दिर का आधा होना चाहिये।।६६।। ✺ वेदिका ✺ हर्म्याङ्गानां कूटकोष्ठादिकानां ग्रीवाधस्ताद् वेदिका योजनीया। हाराभागे वेदिकावेदिका वा नीडं वा तत्रालपनासं च कुर्यात् ।।६७।। भवन के अवयवों के नीचे, कूट एवं कोष्ठ आदि के नीचे एवं ग्रीवा के नीचे वेदिका निर्मित करनी चाहिये। हाराभाग के नीचे वेदिका का निर्माण हो भी सकता है तथा नहीं भी हो सकता है। वहाँ नीड एवं अल्प-नास का निर्माण ( ऊपरी भाग में ) होना चाहिये।।६७।। ✺ तोरणादिविधानम् ✺ तोरणं त्रिविधं पत्रतोरणं मकरान्वितम्। चित्रतोरणमित्येषां मण्डनं त्वधुनोच्यते ।।६८।। तोरण आदि का विधान—तोरण तीन प्रकार के होते हैं—पत्र-तोरण, मकर- तोरण एवं चित्र-तोरण। अब इनकी सज्जा का वर्णन किया जा रहा है।।६८।। बालचन्द्रनिभं पत्रैश्चित्रितं पत्रतोरणम्। द्वयोर्मकरयोर्वक्त्रस्थितमध्यमपूरितम् ।।६९।। नानाविधलतायुक्तमेतन्मकरतोरणम् । उगते हुये चन्द्रमा के समान एवं पत्रों से अलङ्कृत तोरण को 'पत्रतोरण' कहते हैं। मध्य में दो मकरों के मुख पर स्थित पूरिन ( शिव ) हों एवं तोरण पर विविध प्रकार की लतायें निर्मित हों तो वह 'मकरतोरण' होता है।।६९।। तदेव पार्श्वयोर्मध्यं पूरिमध्यं द्वयोस्ततः ।।७०।। नक्रतुण्डं प्रगृह्यैव द्वयोरास्यविनिर्गतैः । विद्याधरैश्च भूतैश्च सिंहैर्व्यालैश्च हंसकैः ।।७१।। बालैः स्रग्दामकैरन्यैर्मणिबन्धैर्विचित्रितम्। चित्रतोरणमेतत् स्याद् देवानां भूभुजां वरम् ।।७२।। ( चित्रतोरण में ) मध्य भाग में पूरिन ( शिव ) स्थित रहते हैं, जिन्हें नक्र-तुण्ड ( मकरों के मुख का अग्र-भाग ) दोनों ओर से पकड़े रहता है। दोनों मकर-मुखों से