भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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२६० मयमतम् विद्याधर, भूत, सिंह, व्याल, हंस एवं बच्चे निकलते हैं जो पुष्पों की माला, अन्य मणिबन्ध आदि आभूषणों से सुसज्जित रहते हैं। इस तोरण की संज्ञा 'चित्रतोरण' है तथा यह देवों एवं राजाओं के लिये ( देवालय एवं राज-भवन में ) प्रशस्त होता है। गुहासु प्रतिमास्तासु पार्श्वपाद्युतानि च। तोरणान्युत्तराधस्तात् प्रयोज्यानि विचक्षणैः ॥७३॥ इस तोरण की गुहाओं ( सजावटी खिड़कियों के भीतर का कक्षनुमा स्थान ) में प्रतिमायें होती हैं। तोरण के दोनों पार्श्वों में स्तम्भ होते हैं एवं नीचे उत्तर होते हैं। स्तम्भोच्चे पञ्चषट्सप्तद्व्यंशोच्चं तोरणाग्रकम्। शेषं पादोदयं पादं चतुरश्राष्टवृत्तयुक् ॥७४॥ कुम्भमण्ड्यादिसंयुक्तं पोतिकारहितं तु वा। उत्तरं वाजनं साब्जक्षेपणं क्षुद्रवाजनम् ॥७५॥ स्तम्भ की ऊँचाई को पाँच, छः या सात भागों में बाँटना चाहिये। दो भाग तोरण के ऊर्ध्व भाग के लिये एवं शेष भाग स्तम्भ के लिये छोड़ना चाहिये। स्तम्भ चौकोर, अष्टकोण या वृत्ताकार होना चाहिये। यह कुम्भ एवं मण्डि से युक्त एवं पोतिका के बिना भी हो सकता है। इसके अतिरिक्त उत्तर, वाजन, अब्ज-क्षेपण एवं क्षुद्र-वाजन निर्मित होते हैं।॥७४-७५।। पोतिकोपरि वा कुर्याद् वीरकाण्डस्य चोपरि। उत्सन्ध्यन्तानताग्रं तु कुर्यान्मकरविष्टरम् ॥७६॥ पोतिका के ऊपर या वीरकाण्ड के ऊपर ( स्तम्भ की ) सन्धि के ऊर्ध्व भाग पर मकर-विष्टर ( मकराकृति ढलान ) निर्मित करना चाहिये।॥७६॥ तुङ्गार्धं त्रिचतुष्पञ्चदण्डतोरणविस्तृतम्। द्वारतुल्योन्नतं व्यासान्तरं स्तम्भद्वयोरपि ॥७७॥ उत्तरोत्तरयुक्ताष्टमङ्गलोर्ध्वस्थनक्रवत् । फलकं पञ्चवक्त्रं तु तदूर्ध्वे शूलसंयुतम् ॥७८॥ छत्रकेतुपताकाश्रीभेरी कुम्भं च दीपिका। नन्द्यावर्तेन चाष्टौ हि सर्वेषामष्टमङ्गलम् ॥७९॥ एवं प्रोक्तं चतुर्भेदं देवादीनां तु तोरणम्। तोरण की ऊँचाई की आधी उसकी चौड़ाई रखनी चाहिये ( अथवा ) तीन, चार या पाँच दण्ड तोरण का विस्तार रखना चाहिये। ( अथवा ) तोरण की ऊँचाई द्वार के