भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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एकविंशोऽध्यायः 卐 त्रिभूमिविधानम् २६१ बराबर हो एवं चौड़ाई दोनों स्तम्भों के मध्यभाग के बराबर होनी चाहिये। ऊपरी भाग में मकर के आकार का उत्तर निर्मित करना चाहिये, जिस पर अष्ट-मङ्गल पदार्थ अङ्कित हों। फलक पर पञ्चवक्त्र (शिव) अङ्कित हों एवं ऊर्ध्व भाग में शूल निर्मित हो। ऊर्ध्व भाग में छत्र, ध्वज, पताका, श्री, भेरी, कुम्भ, दीप एवं नन्द्यावर्त आकृति (स्वस्तिक) सभी पर इन अष्टमङ्गल चिह्नों का अङ्कन होना चाहिये। इस देवता आदि के (भवनों में) चार प्रकार के तोरणों के भेद वर्णित हैं।।७७-७९।। पद्मासनोर्ध्वं कुम्भस्य तिर्यक् चारुलताकृतिः ॥८०॥ तदूर्ध्वं फलकोर्ध्वाब्जमिष्टकुम्भलताग्रकम् ॥८१॥ पद्मासन (पद्म-फलक) के ऊपर कुम्भ के तिरछे (पार्श्व में) सुन्दर लता की आकृति होनी चाहिये। उसके ऊपरी फलक के ऊर्ध्व भाग में कुम्भ की लता के अग्र भाग में पद्म-पुष्प अङ्कित होना चाहिये॥८०-८१॥ पद्मकुम्भलतैवं स्यादन्यदप्येवमूह्यताम् । तदेवोत्सन्धिकोध्वे॑ तु वीरकाण्डसमन्वितम् ॥८२॥ स्तम्भकुम्भलतैव स्याद् स्तम्भतोरणवच्छिरः । हारायां तु प्रकर्तव्या दैवेऽदैवे निकेतने ॥८३॥ पद्म, कुम्भ एवं लता तथा अन्य सज्जाओं का भी अङ्कन होना चाहिये। ऊपरी जोड़ के ऊपर वीरकाण्ड होना चाहिये। ऊर्ध्व भाग में स्तम्भकुम्भलता एवं स्तम्भ- तोरण होना चाहिये। देवालय एवं उससे भिन्न (मनुष्य-आवास) में हारा-मार्ग का निर्माण करना चाहिये।।८२-८३।। षडष्टदशमार्ताण्डमनुवैकारमात्रकैः । व्यासं तारार्धनिष्क्रान्तं द्विद्व्यंशं वा त्रिभागिकम् ॥८४॥ वृत्ताकारसमं छत्रं तोरणाङ्घ्रिवदायतम् । सकन्धरं तदूर्ध्वे तु शुकनास्या विभूषितम् ॥८५॥ वृत्तस्फुटितमित्युक्तं द्युसदां सद्मभूषणम् । 'वृत्तस्फुटित' देवालयों का अलङ्करण होता है। इसकी लम्बाई तोरण के स्तम्भ के बराबर होती है। इसकी चौड़ाई छः, आठ, दश, बारह या चौदह माप (मात्रक) की होनी चाहिये तथा निष्क्रान्त (बाहर निकला भाग) चौड़ाई का आधा, दो तिहाई या एक तिहाई होना चाहिये। इसका आच्छादन गोलाकार होता है। ऊर्ध्व भाग कन्धर (गल) से युक्त होता है, जिस पर 'शुकनासी' निर्मित होती है।।८४-८५।।