भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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२६२ मयमतम् ✹ सोपानम् ✹ तले तले तु सोपानं प्रयुञ्जीत विचक्षणः ॥८६॥ त्रिविधं तस्य मूलं तु चतुरं वृत्तमायतम् । चतुर्विधप्रकारं स्यात्रिखण्डं शङ्खमण्डलम् ॥८७॥ वल्लीमण्डलमप्यर्थगोमूत्रेण समाहितम् । सीढ़ी—प्रत्येक तल में बुद्धिमान व्यक्ति को सीढ़ी का निर्माण करना चाहिये। इसका मूल (प्रारम्भ, प्रकार) तीन प्रकार का सम्भव है—चौकोर, गोलाकार या आयताकार। सीढ़ियों के चार प्रकार होते हैं—त्रिखण्ड, शङ्खमण्डल, वल्ली मण्डल एवं अर्धगोमूत्र॥८६-८७॥ मूलादग्रं क्रमक्षीणं प्रथितं शङ्खमण्डलम् ॥८८॥ स्याद् वल्लीमण्डलं वृक्षारोहिवल्लीसमक्रियम् । अश्वपादोपरि स्थित्यारोहणं दक्षिणाङ्घ्रिणा ॥८९॥ द्विदण्डाद्या सप्तदण्डात् सोपानस्य विशालता । अश्वपादस्य विस्तारो द्विगुणाद्यश्चतुर्गुणात् ॥९०॥ मूल (प्रारम्भ) से ऊपर तक चौड़ाई में क्रमशः क्षीण होने वाला सोपान 'शङ्खमण्डल' है। 'वल्लीमण्डल' सोपान की संरचना वृक्ष पर चढ़ी हुई (गोलाई में लिपटी हुई) लता के समान की जाती है। अश्वपाद (अश्व के खुर अथवा अर्धचन्द्र का प्रथम सोपान पट्टी) के ऊपर से प्रारम्भ होकर दक्षिण की ओर मुड़ते हुये दो दण्ड से लेकर सात दण्डपर्यन्त सोपान की चौड़ाई हो सकती है। अश्वपाद का विस्तार सोपान के प्रमाण से दुगुना से लेकर चार गुना तक होता है॥८८-९०॥ शयितव्यासपादार्धत्रिपादांशं दृशोदयैः । स्थितानीभबालवृद्धसमखण्डान्यनुक्रमात् ॥९१॥ शयानफलकव्यासः षोडशाष्टादशाङ्गुलाः । समुद्गतं षडंशैकमेवं सोपानकल्पनम् ॥९२॥ सोपान-पट्टियों के मध्य की ऊँचाई शयित व्यास (लेटाई गई पट्टियों की चौड़ाई) की चौथाई, आधी या तीन चौथाई होनी चाहिये। गज, बच्चों एवं वृद्धों को ध्यान में रखते हुये सोपान-पट्टियों को बराबर भागों में बाँटना चाहिये (अर्थात् उनकी लम्बाई- चौड़ाई आदि पूर्व-निर्धारित प्रमाण में हो)। सोपान के बिछे फलक का व्यास (गहराई) सोलह से अठारह अङ्गुल होना चाहिये एवं ऊँचाई उसके छठे भाग के बराबर होनी चाहिये। इस प्रकार सोपान का निर्माण करना चाहिये॥९१-९२॥