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मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

एकविंशोऽध्यायः 卐 त्रिभूमिविधानम् २५९ गर्भगृह—गर्भगृह अथवा नाली-गृह का प्रमाण देवालय का तीसरा भाग, पाँच भाग में तीन भाग, सात में चार भाग, नौ में पाँच भाग, ग्यारह में छः भाग, तेरह में सात भाग, पन्द्रह में आठ भाग, सत्रह में नौ भाग अथवा मन्दिर का आधा होना चाहिये।।६६।। ✺ वेदिका ✺ हर्म्याङ्गानां कूटकोष्ठादिकानां ग्रीवाधस्ताद् वेदिका योजनीया। हाराभागे वेदिकावेदिका वा नीडं वा तत्रालपनासं च कुर्यात् ।।६७।। भवन के अवयवों के नीचे, कूट एवं कोष्ठ आदि के नीचे एवं ग्रीवा के नीचे वेदिका निर्मित करनी चाहिये। हाराभाग के नीचे वेदिका का निर्माण हो भी सकता है तथा नहीं भी हो सकता है। वहाँ नीड एवं अल्प-नास का निर्माण ( ऊपरी भाग में ) होना चाहिये।।६७।। ✺ तोरणादिविधानम् ✺ तोरणं त्रिविधं पत्रतोरणं मकरान्वितम्। चित्रतोरणमित्येषां मण्डनं त्वधुनोच्यते ।।६८।। तोरण आदि का विधान—तोरण तीन प्रकार के होते हैं—पत्र-तोरण, मकर- तोरण एवं चित्र-तोरण। अब इनकी सज्जा का वर्णन किया जा रहा है।।६८।। बालचन्द्रनिभं पत्रैश्चित्रितं पत्रतोरणम्। द्वयोर्मकरयोर्वक्त्रस्थितमध्यमपूरितम् ।।६९।। नानाविधलतायुक्तमेतन्मकरतोरणम् । उगते हुये चन्द्रमा के समान एवं पत्रों से अलङ्कृत तोरण को 'पत्रतोरण' कहते हैं। मध्य में दो मकरों के मुख पर स्थित पूरिन ( शिव ) हों एवं तोरण पर विविध प्रकार की लतायें निर्मित हों तो वह 'मकरतोरण' होता है।।६९।। तदेव पार्श्वयोर्मध्यं पूरिमध्यं द्वयोस्ततः ।।७०।। नक्रतुण्डं प्रगृह्यैव द्वयोरास्यविनिर्गतैः । विद्याधरैश्च भूतैश्च सिंहैर्व्यालैश्च हंसकैः ।।७१।। बालैः स्रग्दामकैरन्यैर्मणिबन्धैर्विचित्रितम्। चित्रतोरणमेतत् स्याद् देवानां भूभुजां वरम् ।।७२।। ( चित्रतोरण में ) मध्य भाग में पूरिन ( शिव ) स्थित रहते हैं, जिन्हें नक्र-तुण्ड ( मकरों के मुख का अग्र-भाग ) दोनों ओर से पकड़े रहता है। दोनों मकर-मुखों से

२६० मयमतम् विद्याधर, भूत, सिंह, व्याल, हंस एवं बच्चे निकलते हैं जो पुष्पों की माला, अन्य मणिबन्ध आदि आभूषणों से सुसज्जित रहते हैं। इस तोरण की संज्ञा 'चित्रतोरण' है तथा यह देवों एवं राजाओं के लिये ( देवालय एवं राज-भवन में ) प्रशस्त होता है। गुहासु प्रतिमास्तासु पार्श्वपाद्युतानि च। तोरणान्युत्तराधस्तात् प्रयोज्यानि विचक्षणैः ॥७३॥ इस तोरण की गुहाओं ( सजावटी खिड़कियों के भीतर का कक्षनुमा स्थान ) में प्रतिमायें होती हैं। तोरण के दोनों पार्श्वों में स्तम्भ होते हैं एवं नीचे उत्तर होते हैं। स्तम्भोच्चे पञ्चषट्सप्तद्व्यंशोच्चं तोरणाग्रकम्। शेषं पादोदयं पादं चतुरश्राष्टवृत्तयुक् ॥७४॥ कुम्भमण्ड्यादिसंयुक्तं पोतिकारहितं तु वा। उत्तरं वाजनं साब्जक्षेपणं क्षुद्रवाजनम् ॥७५॥ स्तम्भ की ऊँचाई को पाँच, छः या सात भागों में बाँटना चाहिये। दो भाग तोरण के ऊर्ध्व भाग के लिये एवं शेष भाग स्तम्भ के लिये छोड़ना चाहिये। स्तम्भ चौकोर, अष्टकोण या वृत्ताकार होना चाहिये। यह कुम्भ एवं मण्डि से युक्त एवं पोतिका के बिना भी हो सकता है। इसके अतिरिक्त उत्तर, वाजन, अब्ज-क्षेपण एवं क्षुद्र-वाजन निर्मित होते हैं।॥७४-७५।। पोतिकोपरि वा कुर्याद् वीरकाण्डस्य चोपरि। उत्सन्ध्यन्तानताग्रं तु कुर्यान्मकरविष्टरम् ॥७६॥ पोतिका के ऊपर या वीरकाण्ड के ऊपर ( स्तम्भ की ) सन्धि के ऊर्ध्व भाग पर मकर-विष्टर ( मकराकृति ढलान ) निर्मित करना चाहिये।॥७६॥ तुङ्गार्धं त्रिचतुष्पञ्चदण्डतोरणविस्तृतम्। द्वारतुल्योन्नतं व्यासान्तरं स्तम्भद्वयोरपि ॥७७॥ उत्तरोत्तरयुक्ताष्टमङ्गलोर्ध्वस्थनक्रवत् । फलकं पञ्चवक्त्रं तु तदूर्ध्वे शूलसंयुतम् ॥७८॥ छत्रकेतुपताकाश्रीभेरी कुम्भं च दीपिका। नन्द्यावर्तेन चाष्टौ हि सर्वेषामष्टमङ्गलम् ॥७९॥ एवं प्रोक्तं चतुर्भेदं देवादीनां तु तोरणम्। तोरण की ऊँचाई की आधी उसकी चौड़ाई रखनी चाहिये ( अथवा ) तीन, चार या पाँच दण्ड तोरण का विस्तार रखना चाहिये। ( अथवा ) तोरण की ऊँचाई द्वार के

एकविंशोऽध्यायः 卐 त्रिभूमिविधानम् २६१ बराबर हो एवं चौड़ाई दोनों स्तम्भों के मध्यभाग के बराबर होनी चाहिये। ऊपरी भाग में मकर के आकार का उत्तर निर्मित करना चाहिये, जिस पर अष्ट-मङ्गल पदार्थ अङ्कित हों। फलक पर पञ्चवक्त्र (शिव) अङ्कित हों एवं ऊर्ध्व भाग में शूल निर्मित हो। ऊर्ध्व भाग में छत्र, ध्वज, पताका, श्री, भेरी, कुम्भ, दीप एवं नन्द्यावर्त आकृति (स्वस्तिक) सभी पर इन अष्टमङ्गल चिह्नों का अङ्कन होना चाहिये। इस देवता आदि के (भवनों में) चार प्रकार के तोरणों के भेद वर्णित हैं।।७७-७९।। पद्मासनोर्ध्वं कुम्भस्य तिर्यक् चारुलताकृतिः ॥८०॥ तदूर्ध्वं फलकोर्ध्वाब्जमिष्टकुम्भलताग्रकम् ॥८१॥ पद्मासन (पद्म-फलक) के ऊपर कुम्भ के तिरछे (पार्श्व में) सुन्दर लता की आकृति होनी चाहिये। उसके ऊपरी फलक के ऊर्ध्व भाग में कुम्भ की लता के अग्र भाग में पद्म-पुष्प अङ्कित होना चाहिये॥८०-८१॥ पद्मकुम्भलतैवं स्यादन्यदप्येवमूह्यताम् । तदेवोत्सन्धिकोध्वे॑ तु वीरकाण्डसमन्वितम् ॥८२॥ स्तम्भकुम्भलतैव स्याद् स्तम्भतोरणवच्छिरः । हारायां तु प्रकर्तव्या दैवेऽदैवे निकेतने ॥८३॥ पद्म, कुम्भ एवं लता तथा अन्य सज्जाओं का भी अङ्कन होना चाहिये। ऊपरी जोड़ के ऊपर वीरकाण्ड होना चाहिये। ऊर्ध्व भाग में स्तम्भकुम्भलता एवं स्तम्भ- तोरण होना चाहिये। देवालय एवं उससे भिन्न (मनुष्य-आवास) में हारा-मार्ग का निर्माण करना चाहिये।।८२-८३।। षडष्टदशमार्ताण्डमनुवैकारमात्रकैः । व्यासं तारार्धनिष्क्रान्तं द्विद्व्यंशं वा त्रिभागिकम् ॥८४॥ वृत्ताकारसमं छत्रं तोरणाङ्घ्रिवदायतम् । सकन्धरं तदूर्ध्वे तु शुकनास्या विभूषितम् ॥८५॥ वृत्तस्फुटितमित्युक्तं द्युसदां सद्मभूषणम् । 'वृत्तस्फुटित' देवालयों का अलङ्करण होता है। इसकी लम्बाई तोरण के स्तम्भ के बराबर होती है। इसकी चौड़ाई छः, आठ, दश, बारह या चौदह माप (मात्रक) की होनी चाहिये तथा निष्क्रान्त (बाहर निकला भाग) चौड़ाई का आधा, दो तिहाई या एक तिहाई होना चाहिये। इसका आच्छादन गोलाकार होता है। ऊर्ध्व भाग कन्धर (गल) से युक्त होता है, जिस पर 'शुकनासी' निर्मित होती है।।८४-८५।।

२६२ मयमतम् ✹ सोपानम् ✹ तले तले तु सोपानं प्रयुञ्जीत विचक्षणः ॥८६॥ त्रिविधं तस्य मूलं तु चतुरं वृत्तमायतम् । चतुर्विधप्रकारं स्यात्रिखण्डं शङ्खमण्डलम् ॥८७॥ वल्लीमण्डलमप्यर्थगोमूत्रेण समाहितम् । सीढ़ी—प्रत्येक तल में बुद्धिमान व्यक्ति को सीढ़ी का निर्माण करना चाहिये। इसका मूल (प्रारम्भ, प्रकार) तीन प्रकार का सम्भव है—चौकोर, गोलाकार या आयताकार। सीढ़ियों के चार प्रकार होते हैं—त्रिखण्ड, शङ्खमण्डल, वल्ली मण्डल एवं अर्धगोमूत्र॥८६-८७॥ मूलादग्रं क्रमक्षीणं प्रथितं शङ्खमण्डलम् ॥८८॥ स्याद् वल्लीमण्डलं वृक्षारोहिवल्लीसमक्रियम् । अश्वपादोपरि स्थित्यारोहणं दक्षिणाङ्घ्रिणा ॥८९॥ द्विदण्डाद्या सप्तदण्डात् सोपानस्य विशालता । अश्वपादस्य विस्तारो द्विगुणाद्यश्चतुर्गुणात् ॥९०॥ मूल (प्रारम्भ) से ऊपर तक चौड़ाई में क्रमशः क्षीण होने वाला सोपान 'शङ्खमण्डल' है। 'वल्लीमण्डल' सोपान की संरचना वृक्ष पर चढ़ी हुई (गोलाई में लिपटी हुई) लता के समान की जाती है। अश्वपाद (अश्व के खुर अथवा अर्धचन्द्र का प्रथम सोपान पट्टी) के ऊपर से प्रारम्भ होकर दक्षिण की ओर मुड़ते हुये दो दण्ड से लेकर सात दण्डपर्यन्त सोपान की चौड़ाई हो सकती है। अश्वपाद का विस्तार सोपान के प्रमाण से दुगुना से लेकर चार गुना तक होता है॥८८-९०॥ शयितव्यासपादार्धत्रिपादांशं दृशोदयैः । स्थितानीभबालवृद्धसमखण्डान्यनुक्रमात् ॥९१॥ शयानफलकव्यासः षोडशाष्टादशाङ्गुलाः । समुद्गतं षडंशैकमेवं सोपानकल्पनम् ॥९२॥ सोपान-पट्टियों के मध्य की ऊँचाई शयित व्यास (लेटाई गई पट्टियों की चौड़ाई) की चौथाई, आधी या तीन चौथाई होनी चाहिये। गज, बच्चों एवं वृद्धों को ध्यान में रखते हुये सोपान-पट्टियों को बराबर भागों में बाँटना चाहिये (अर्थात् उनकी लम्बाई- चौड़ाई आदि पूर्व-निर्धारित प्रमाण में हो)। सोपान के बिछे फलक का व्यास (गहराई) सोलह से अठारह अङ्गुल होना चाहिये एवं ऊँचाई उसके छठे भाग के बराबर होनी चाहिये। इस प्रकार सोपान का निर्माण करना चाहिये॥९१-९२॥

एकविंशोऽध्यायः 卐 त्रिभूमिविधानम् २६३ हस्तव्यासं द्विदण्डं तत्पादव्यासं तु बाहलम्। हस्ते यथाबलं योज्यं प्रविशेत् स्थितशायिनोः ॥९३॥ हस्त की चौड़ाई दो दण्ड एवं मोटाई उसकी चतुर्थांश होनी चाहिये। स्थित ( खड़ी स्थिति ) एवं शायिन ( लेटी स्थिति ) वाले फलकों को हस्त में दृढ़तापूर्वक बैठाना चाहिये। ( हस्त सीढ़ी के पार्श्व का एक अङ्ग है ) ॥९३॥ अयुग्ममेव सोपानं गुह्यागुह्यवशात्ततः। एकभक्तिविनिष्क्रान्तं मण्डपादिषु बाह्यतः ॥९४॥ सोपानों की संख्या विषम होनी चाहिये। ये गुप्त ( भित्ति आदि में छिपी ) या प्रकट हो सकती हैं। मण्डप आदि में बाहर की ओर एक भित्ति ( सीढ़ी का एक विशेष भाग ) निकली होनी चाहिये ॥९४॥ सोपानं सर्ववर्णानां प्रादक्षिण्याधिरोहणम्। प्रशस्तं विपरीतं तद् विनाशाय भवेदिह ॥९५॥ सभी वर्ण वाले व्यक्तियों के भवन में सीढ़ी दक्षिण ( दाहिनी ) की ओर घूमनी चाहिये। यह शुभ होता है। इसके विपरीत ( बाँयीं ओर मुड़ना ) विनाशकारक होता है॥९५॥ अधिष्ठानाधिरोहार्थं सोपानं पार्श्वयोर्मुखम्। हस्तिहस्तं चाश्वपादफलकान्तं प्रयोजयेत् ॥९६॥ अधिष्ठान पर चढ़ने के लिये निर्मित सोपान मुख एवं दोनों पार्श्वों की ओर होना चाहिये। हस्तिहस्त ( सीढ़ी का एक भाग, सम्भवतः रेलिङ्ग ) का निर्माण अश्वपाद से लेकर फलक ( ऊपरी फलक ) तक होना चाहिये ॥९६॥ सोपानं तदधिष्ठानस्तम्भप्रस्तरवद् भवेत्। एवं विधिविशिष्टं तु सोपानं सम्पदां पदम् ॥९७॥ अधिष्ठान का सोपान उसके स्तम्भ-प्रस्तर के बराबर ( ऊँचा ) होना चाहिये। इस विधि से निर्मित सोपान सम्पत्ति-कारक होता है ॥९७॥ एवं प्रोक्तं दैवतानां नराणां वासे योग्यं तोरणं चैव युक्त्या। सोपानं तद्भेदमाकारमस्मिन् सम्यग् योज्यं वास्तुविद्याविधिज्ञैः ॥९८॥ इस प्रकार देवालय एवं मनुष्यों के आवास के अनुरूप तोरण एवं सोपान के भेद एवं आकार का वर्णन किया गया। वास्तु-विद्या के ज्ञाता को भवन के अनुसार उचित रीति से इनकी योजना बनानी चाहिये ॥९८॥

२६४ मयमत्म् स्यान्नागरं द्राविडवेसरं च क्रमेण वै सत्त्वरजस्तमांसि। महीसुरोर्वीपतिवैश्यकास्ते हरिर्विधाता हर आधिदैवाः ॥९९॥ इति मयमते वास्तुशास्त्रे त्रिभूमिविधानो नामैकविंशोऽध्यायः इस प्रकार इनके (भवन के) तीन भेद—नागर, द्राविड एवं वेसर होते हैं, जो क्रमशः सत्त्व, रजस् एवं तमस् के प्रतीक हैं। ये (मनुष्यों में) ब्राह्मण, राजा (क्षत्रिय) एवं वैश्य के तथा (देवों में) हरि, विधाता एवं शिव के (भवन के लिये) अनुकूल होते हैं॥९९॥ व्याख्यात्मक टिप्पणी १. त्रिभूमि-विधान (तीन तल के भवन) का वर्णन शिल्परत्न (पूर्व.-३७.२७-४३) एवं मानसार (अ. २१) में प्राप्त होता है। २. पञ्जर (श्लोक ३) पञ्जर का वर्णन शिल्परत्न (पू.-२६ अ.) में इस प्रकार प्राप्त होता है— शालाकूटान्तरालं तद्द्वारान्तरमिति स्मृतम्। पञ्जरं तत्र कुर्वीत तदनेकविधं भवेत्॥१॥ दण्डैर्द्वित्रिचतुर्मितैर्मितवितानातानकं पञ्जरम् नासाद्युज्ज्वलितं च जालकमधो वेधूर्ध्वतः संस्थितम्। दण्डैर्द्व्यादियुगान्तिमैस्ततमतो दण्डर्द्धितं चायतम् कर्तव्यं द्विगुणान्तिमं सुषिरितं गोमूत्रिकादि क्रमात्॥२॥ पञ्जरं नासिकाकारं कूटकोष्ठाममेव वा। हस्तपृष्ठविमानस्य शिखराकृति वा पुनः॥३॥ इस प्रकार पञ्जर का विशद वर्णन पूरे अध्याय में वर्णित है। ३. स्तम्भतोरण (श्लोक २९-३३) स्तम्भतोरण का परिचय शिल्परत्न (पूर्व. अ. २३) में इस प्रकार प्राप्त होता है— स्तम्भे दिङ्नन्दनागांशिनि झषमनलांशेन शेषेण पादौ व्यासं स्तम्भार्धतोऽब्ध्याशुगरसमितदण्डेन वा तत्र कुर्यात्।

एकविंशोऽध्यायः 卐 त्रिभूमिविधानम् २६५ पत्राविद्धार्धचन्द्रात्मकमथ मकरास्यादिमत् पञ्चभुग्नं कर्तव्यं तोरणं तद्विविधखगलसन्नक्रतुण्डोज्ज्वलं च ।।२७।। अब्जं क्षेपणकं पश्चात् तथैव क्षुद्रवाजनम्। तच्छिष्टं झषमानं तु तोरणावयवं स्मृतम् ।।२८।। स्तम्भे स्तम्भे प्रकर्तव्यं सर्वेषां स्तम्भतोरणम् ।।२९।। पादोच्चं तु त्रिधा भङ्क्त्वा त्रिभागं चरणोदयम्। उत्तरं वाजनं त्वब्जं क्षेपणं क्षुद्रवाजनम् ।।३०।। तदूर्ध्वं झषबन्धं तु शेषभागेन कारयेत्। स्तम्भविस्तारमानेन झषविस्तारमाचरेत् ।।३१।। ४. तीन प्रकार के तोरण ( श्लोक ६८-७२ ) तीन प्रकार के तोरणों का वर्णन शिल्परत्न ( पूर्व., अ. २३ ) में इस प्रकार किया गया है— पत्राख्यं तोरणं त्वादौ द्वितीयं मकराभिधम्। तृतीयं चित्रसंज्ञं तु त्रिविधं तोरणाकृतिः ।।११०।। अर्धचन्द्रसमाकारं पत्रजातिविराजितम्। पत्रतोरणमाख्यातं तच्छूद्राणां गृहोचितम् ।।१११।। पञ्चवक्त्रसमायुक्तं पार्श्वयोर्मकरास्यकम्। मध्ये पूरिमसंयुक्तं नाना

२६६ मयमतम् वेदास्रं दीर्घवेदास्रं वृत्तं चेति त्रियोनिकम्। चतुर्विधं प्रकारैः स्यात्त्रिखण्डं शङ्खमण्डलम्।।१०६।। अर्धगोमूत्रकं चाथ वल्लीमण्डलमित्यपि। त्रिखण्डाकारं रचितं यत्सोपानं त्रिखण्डकम्।।१०७।। इनकी आकृतियों का वर्णन भी शिल्परत्न में प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त ईशानशिवगुरुदेवपद्धति, क्रियापाद में भी सोपान का वर्णन प्राप्त होता है।

अथ द्वाविंशोऽध्यायः ( चतुर्भूम्यादिबहुभूमिविधानम् ) पञ्चमानं चतुर्भौमं वक्ष्ये संक्षेपतः क्रमात् । त्रिचतुष्षङ्क्तिहस्तादिद्विहस्तविवर्धनात् ॥१॥ एकद्वाविंशदन्तं तु व्यासं तुङ्गं तु पूर्ववत् । चार तल से लेकर बहुतलों के देवालयों का विधान—चार तल वाले भवन ( देवालय ) के पाँच प्रकार के प्रमाणों का संक्षेप में क्रमानुसार वर्णन कर रहा हूँ। इसका व्यास तेरह या चौदह हाथ से प्रारम्भ कर दो-दो हाथ बढ़ाते हुये इक्कीस या बाईस हाथ तक जाता है एवं भवन की ऊँचाई पूर्वोक्त नियम के अनुसार रक्खी जाती है॥१॥ ❋ सुभद्रकम् ❋ विस्तारोत्सेधमानाभ्यां भागान् वक्ष्यामि हर्म्यके ॥२॥ त्रयोदशकरव्यासमष्टधा विभजेत् समम् । एकांशं कूटविस्तारं शालायामं द्विभागिकम् ॥३॥ भागेन पञ्जरव्यास मूर्ध्वं तु पुनरष्टधा । प्राग्वदेव सभाशालापञ्जराणामुपर्यपि ॥४॥ विस्तार एवं ऊँचाई के प्रमाण से भवन के भागों की चर्चा कर रहा हूँ। तेरह हस्त के व्यास को बराबर-बराबर आठ भागों में बाँटना चाहिये। एक भाग से कूट का विस्तार, दो भाग से शाला का विस्तार एवं एक भाग से पञ्जर का विस्तार करना चाहिये। उसके ऊपर ( दूसरे तल ) को भी आठ भागों में बाँटना चाहिये। सभाकक्ष, शाला एवं पञ्जर के ऊपर पूर्ववर्णित ( कूटादि ) का निर्माण करना चाहिये॥२-४॥ ऊर्ध्वं षड्भागिके भागमेकं कूटस्य विस्तृतम् । द्विभागं कोष्ठकायामं नीडं भागार्धमिष्यते ॥५॥ ऊपरी भाग ( तीसरी मञ्जिल ) के छः भाग करने चाहिये। एक भाग से कूट का विस्तार, दो भाग से कोष्ठक की लम्बाई एवं आधे भाग से नीड का माप करना चाहिये॥५॥

२६८ मयमतम् तदूर्ध्वं गुणाभागेंडशं मध्ये दण्डेन निर्गमम् । उत्सेधं विभजेद् विद्वान् नवत्रिंशतिसंख्यया ॥६॥ उसके ऊपर ( के तल ) के तीन भाग करना चाहिये। मध्य का भाग एक अंश ( आधा ) रखना चाहिये एवं निर्गम का माप एक दण्ड रखना चाहिये। बुद्धिमान स्थपति को ऊँचाई के उन्तालीस भाग करने चाहिये।।६।। सार्धद्व्यंशमधिष्ठानं पञ्चांशं पाददैर्घ्यकम् । तदर्धं प्रस्तरोत्सेधं सत्रिपादयुगांशकम् ॥७॥ ऊर्ध्वभूम्यङ्‌घ्रिकोत्सेधं सपादद्व्यंशमञ्चकम् । जङ्घा तद्द्विगुणा चोर्ध्वं द्व्यंशेन प्रस्तरोदयम् ॥८॥ पादाधिकचतुर्भागमुपरिस्तम्भतुङ्गकम् । स्यात् सत्रिभागपादेन प्रस्तरं वेदिकांशकम् ॥९॥ गलोच्चमश्विनीभागं सार्धवेदैस्तु मूर्धनि । शेषभागं शिखामानमाहोमं चतुरस्रकम् ॥१०॥ ( प्रथम तल में ) ढाई भाग से अधिष्ठान, पाँच भाग से स्तम्भ की लम्बाई ( प्रथम तल के भवन की ऊँचाई ), ( द्वितीय तल में ) इसके आधे माप की प्रस्तर की ऊँचाई एवं पौने पाँच भाग से ( तल की ) स्तम्भ की ऊँचाई रखनी चाहिये। ( तीसरे तल में ) सवा दो भाग से मञ्चक और उसके दुगुने प्रमाण से जङ्घा होनी चाहिये। इसके ऊपर ( चौथे तल में ) दो भाग से प्रस्तर एवं सवा चार भाग से स्तम्भ की ऊँचाई रखनी चाहिये। इसके ऊपर सवा एक भाग से प्रस्तर, एक भाग से वेदिका, गल की ऊँचाई दो भाग से, शिखर सवा चार भाग से तथा शेष भाग से शिखा का प्रमाण रखना चाहिये। पूरा भवन भूतल से चौकोर होता है।।७-१०।। रविसंख्या भवेत् सौष्ठी कोष्ठं तावत्तु पञ्जरम् । शिखरे वेदनास्यः स्युश्चाल्पनास्या विभूषितम् ॥११॥ स्वस्तिकाकारसंयुक्तं नासिकाभिरलङ्कृतम् । प्राग्वदेव तलं चाधः स्तम्भालङ्कारतोरणम् ॥१२॥ सर्वालङ्कारसंयुक्तमेतद्धर्म्यं सुभद्रकम् । इस भवन में बारह सौष्ठी, बारह कोष्ठ एवं पञ्जर शिखर पर चार नासी होनी चाहिये एवं अल्पनासियों से अलङ्कृत होनी चाहिये। इसे स्वस्तिक की आकृति से एवं नासिका से अलङ्कृत होना चाहिये। तल के नीचे ( अधिष्ठान ) पूर्ववर्णित नियम के अनुसार होना चाहिये तथा स्तम्भ, अलङ्करण एवं तोरण निर्मित होना चाहिये।

द्वाविंशोऽध्यायः 卐 चतुर्भूम्यादिबहुभूमिविधानम् २६९ सभी अलङ्करणों से युक्त इस भवन ( देवालय ) की संज्ञा 'सुभद्रक' होती है। ✸ श्रीविशालम् ✸ सर्वं प्राग्वत्कूटकोष्ठादियुक्त्या मध्ये मध्ये मस्तकं मण्डलाभम् । वृत्ताकारं स्यात् सभानां शिरस्तद्विस्तारार्धेनान्वितं गर्भगेहम् ॥१३॥ शेषं त्र्यंशेनावृतावासपिण्डस्तत्तुल्यं तद्बाह्यतोऽन्धारहारम् । नानाधिष्ठानाङ्घ्रिवेदीप्रयोगं नाम्नेदं स्याच्छ्रीविशालं सुहृद्यम् ॥१४॥ जिस देवालय के ( कोणों पर तथा मध्य में ) कूट एवं कोष्ठ आदि हों तथा बीच- बीच में भवन की छत गोलाई लिये हो, कोणकोष्ठ भी मण्डलाकार हों, गर्भगृह भवन के विस्तार के आधे पर ( मध्य ) स्थित हो, भीतर की भित्ति की मोटाई शेष का तृतीयांश हो तथा यही माप बाहर की भित्ति ( अन्धार हार ) का होना चाहिये। इस भवन के अनुरूप विविध प्रकार के

२७० मयमतम् तदुपर्यष्टभागेन विभजेत् कूटमंशकम् । कोष्ठकस्य तु विस्तारं तदेव द्विगुणायतम् ॥१९॥ कूटशालान्तरे नीडमंशेन परिकल्पयेत् । तदूर्ध्वे रसभागे तु कूटमंशेन कोष्ठकम् ॥२०॥ ऊपरी ( दूसरे ) तल की चौड़ाई को आठ भागों में बाँटना चाहिये। एक भाग से कूट एवं एक भाग से कोष्ठक रखना चाहिये। कोष्ठक की लम्बाई विस्तार की दुगुनी होनी चाहिये। कूट एवं शाला के मध्य में एक भाग से नीड की रचना करनी चाहिये। उसके ऊपर ( तृतीय तल ) के छः भाग करने चाहिये एवं कूट तथा कोष्ठक का निर्माण एक भाग से करना चाहिये ॥१९-२०॥ विस्तारद्विगुणायाममन्तरेऽर्धेन पञ्जरम् । ऊर्ध्वभूमे चतुर्भागे मध्ये दण्डेन निर्गमम् ॥२१॥ अष्टास्रं कर्णकूटं स्यात् कोष्ठकं क्रकरीकृतम् । महाशिखरमष्टास्रमष्टनास्या विभूषितम् ॥२२॥ कूटकोष्ठकनीडानां संख्यायां पूर्ववत् ततिः । अस्याप्युत्सेधभागं च पूर्ववत् परिकल्पयेत् ॥२३॥ भद्रकोष्ठमिदं नाम्ना वेदभौमं दिवौकसाम् । ( कूट एवं कोष्ठक की ) लम्बाई चौड़ाई की दुगुनी होनी चाहिये। इनके मध्य में आधे भाग से पञ्जर होना चाहिये। इसके ऊपरी भाग के चार भाग होने चाहिये। मध्य भाग में एक दण्ड का निर्गम होना चाहिये। कर्णकूट अष्टकोण हों एवं कोष्ठक क्रकरी ( दिशाओं में कोण ) हों। महाशिखर अष्टकोण हो तथा आठ नासियों से अलङ्कृत हो। कूट, कोष्ठक एवं नीड की संख्या, विस्तार एवं ऊँचाई आदि के माप पूर्वोक्त रीति से होने चाहिये। चार तल वाला यह देवालय 'भद्रकोष्ठ' संज्ञक होता है ॥२१-२३॥ ✺ जयावहम् ✺ सप्तदशकरव्यासं दशभागैर्विभाजयेत् ॥२४॥ नालीगृहं चतुर्भागमंशेनान्धारिका भवेत् । अलिन्द्रमंशमंशेन परितः खण्डहर्म्यकम् ॥२५॥ सत्रह हाथ के व्यास को दश भागों में बाँटना चाहिये। चार भाग से नालीगृह ( गर्भगृह ), एक भाग से अन्धारिका ( भीतरी भित्ति ), एक भाग से अलिन्द एवं एक भाग से चारो ओर खण्ड-हर्म्यक का निर्माण करना चाहिये ॥२४-२५॥

द्वाविंशोऽध्यायः 卐 चतुर्भूम्यादिबहुभूमिविधानम् २७१ कूटं कोष्ठं च नीडं च भागेन परिकल्पयेत् । कोष्ठायामं द्विभागं स्याच्छेषं हारा सपञ्जरम् ॥२६॥ कूट, कोष्ठ एवं नीड की रचना एक-एक भाग से करनी चाहिये। कोष्ठ की लम्बाई चौड़ाई की दुगुनी हो एवं शेष भाग से पञ्जरयुक्त हारा का निर्माण करना चाहिये।।२६।। जलस्थलं विहायोर्ध्वं वसुभागैर्विभाजिते । भागेन कूटविस्तारं कोष्ठकं द्विगुणायतम् ॥२७॥ हारान्तरे तथांशेन लम्बपञ्जरमीरितम् । तदूर्ध्वे रसभागे तु भागं सौष्ठिकविस्तृतम् ॥२८॥ इसके ऊपर ( दूसरे तल ) जलस्थान को छोड़ कर आठ भाग करना चाहिये। एक भाग से कूट की चौड़ाई रखनी चाहिये। कोष्ठक की लम्बाई चौड़ाई की दुगुनी होनी चाहिये। हारा के मध्य में एक भाग से लम्ब पञ्जर ( लटकती हुई सजावटी आकृति ) होनी चाहिये। इसके ऊपर ( तीसरे तल पर ) छः भाग करने चाहिये। एक भाग से सौष्ठिक का विस्तार करना चाहिये।।२७-२८।। द्विभागं कोष्ठकायामं हारायां क्षुद्रपञ्जरम् । तदूर्ध्वे तु त्रिभागेन मध्ये दण्डेन निर्गमम् ॥२९॥ कोष्ठक की लम्बाई ( चौड़ाई की ) दुगुनी होनी चाहिये। हारामार्ग में क्षुद्र-पञ्जर होना चाहिये। उसके ऊपर ( चतुर्थ तल पर ) के तीन भाग होने चाहिये। मध्य भाग में एक दण्ड का निर्गम निर्मित होना चाहिये।।२९।। चतुरस्रमधिष्ठानमष्टास्रं गलमस्तकम् । त्रिचतुष्कोष्ठकं तावत् सौष्ठिकं चाष्टपञ्जरम् ॥३०॥ लम्बपञ्जरमष्टौ हि क्षुद्रनीडं द्विरष्टकम् । गलनास्यष्टसंयुक्तं कोष्ठकं किञ्चिदुन्नतम् ॥३१॥ नानामसूरकस्तम्भवेदीजालकतोरणम् । नानालङ्कारसंयुक्तं नानाचित्रैर्विचित्रितम् ॥३२॥ सोपपीठमधिष्ठानं केवलं वा मसूरकम् । स्वस्तिकाकारसंयुक्तं नासिकाभिरलङ्कृतम् ॥३३॥ पूर्ववत् तुङ्गभागं स्यादेतन्नाम्ना जयावहम् । इस भवन ( देवालय ) का अधिष्ठान चौकोर होना चाहिये एवं गल तथा मस्तक

२७२ मयमतम् आठ कोण का होना चाहिये। बारह कोष्ठक, बारह सौष्ठिक एवं आठ पञ्जर होना चाहिये। आठ लम्बपञ्जर एवं सोलह क्षुद्रनीड होना चाहिये। गल पर आठ नासी हों एवं कोष्ठक कुछ ऊँचे हों। विभिन्न प्रकार के मसूरक, स्तम्भ, वेदी, जालक (झरोखा, रोशनदान) एवं तोरण हों। नाना प्रकार के अलङ्करणों एवं विभिन्न प्रकार के अङ्कनों से युक्त हो। अधिष्ठान उपपीठ से युक्त हो या केवल मसूरक हो। स्वस्तिक की आकृति निर्मित हो एवं नासिकाओं से सुसज्जित हो। ऊँचे भाग की संरचना पूर्व-वर्णित विधि से हो। इस देवालय को 'जयावह' संज्ञा दी गई है।।३०-३३।। ✺ भद्रकूटम् ✺ नवपङ्क्तिकरव्यासे दशभागविभाजिते ॥३४॥ गर्भगेहं चतुर्भागं गृहपिण्डस्तदंशके । अन्धारमंशमंशेन परितः खण्डहर्म्यकम् ॥३५॥ कूटकोष्ठकनीडानां तारमंशेन योजयेत् । कोष्ठकं द्विगुणायामं हारा भागसमन्विता ॥३६॥ उन्नीस हाथ की चौड़ाई को दश भागों में बाँटा जाता है। चार भाग से गर्भगृह, एक भाग से भित्ति की मोटाई, एक भाग से अन्धार, एक भाग से चारो ओर खण्ड- हर्म्यक, एक-एक भाग से कूट, कोष्ठक एवं नीड की चौड़ाई रखनी चाहिये। कोष्ठक की लम्बाई चौड़ाई की दुगुनी होनी चाहिये तथा एक भाग से हारा-मार्ग की रचना होनी चाहिये।।३४-३६।। ✺ कपोतपञ्जरम् ✺ पञ्चांशे सौष्ठिकव्यासे मध्ये द्व्यंशेन विस्तरम् । एकभागविनिष्क्रान्तयुग्मस्तम्भसमन्वितम् ॥३७॥ सोपपीठमधिष्ठानं समञ्चं सवितर्दिकम् । सकन्धरशिरोयुक्तं सर्वालङ्कारसंयुतम् ॥३८॥ पादुकोत्तरयोर्मध्ये नवांशेनोपपीठकम् । मसूरकं द्विभागोच्चं द्विगुणं स्तम्भदैर्घ्यकम् ॥३९॥ सार्धांशं प्रस्तरोत्सेधमर्धांशं वेदिकोदयम् । उत्तरादिकपोतान्तं गलोदयमितीरितम् ॥४०॥ सौष्ठिक का व्यास मध्य में पाँच में से दो भाग से निर्मित होना चाहिये। एक भाग से विनिष्क्रान्त का निर्माण होना चाहिये, जो दो स्तम्भों से युक्त हो। यह उपपीठ, अधिष्ठान, मञ्च, वितर्दिक, कन्धर एवं शिरोभाग से युक्त हो तथा सभी अलङ्करणों से

द्वाविंशोऽध्यायः चतुर्भूम्यादिबहुभूमिविधानम् २७३ युक्त हो। पादुक से उत्तर के मध्य नौ भाग से उपपीठ, दो भाग ऊँचा मसूरक, उसका दुगुना ऊँचा स्तम्भ, आधे भाग से प्रस्तर की ऊँचाई, आधे भाग से वेदिका तथा उत्तर से प्रारम्भ कर कपोत तक गल का निर्माण करना चाहिये।।३७-४०।। पञ्जराकृतिसंयुक्तं कपोतात्तु विनिर्गतम् । यथाशोभं यथायुक्ति तथा शक्तिध्वजान्वितम् ।।४१।। 'कपोतपञ्जरं ह्येतत् प्रासादे सार्वदेशिके । हारायां वाऽथ शालायां मध्ये मध्ये तु योजयेत् ।।४२।। पञ्जर की आकृति से युक्त एवं कपोत से विनिर्गत (कपोतपञ्जर) होता है। जिस प्रकार अच्छा लगे एवं ठीक हो, उस प्रकार शक्ति-ध्वज से युक्त होना चाहिये। यह कपोतपञ्जर सभी प्रकार के देवालय के अनुकूल होता है। इसे हारा के या शाला के मध्य में निर्मित करना चाहिये।।४१-४२।। ✵ पुनः भद्रकूटम् ✵ कूटकोष्ठकनीडं चैवान्तरप्रस्तरान्वितम् । जलस्थलं विहायोर्ध्वभूमावष्टांशसौष्ठिकम् ।।४३।। द्विगुणं कोष्ठकायामं तयोर्मध्ये तु पञ्जरम् । तदूर्ध्वे रसभागे तु सौष्ठिकोष्ठं तु पूर्ववत् ।।४४।। विजयस्य यथा प्रोक्तं शेषमूर्ध्वं तु योजयेत् । कूटकोष्ठादि सर्वाङ्गं पूर्ववत् संख्यया विदुः ।।४५।। महानीडं द्विरष्टौ स्यान्नाम्नेदं भद्रकूटकम् । कूट, कोष्ठक एवं नीड अन्तर-प्रस्तर से युक्त होते हैं। इसके ऊपर जल-स्थल को छोड़ कर आठ भाग बचते हैं। एक भाग से सौष्ठिक का निर्माण होना चाहिये। कोष्ठक की लम्बाई (चौड़ाई की) दुगुनी होनी चाहिये। उनके मध्य में पञ्जर होना चाहिये। उसके ऊपर छः भाग करना चाहिये। सौष्ठिक एवं कोष्ठ पहले की भाँति होने चाहिये। इसके ऊपरी भाग में जो योजना 'विजय' के लिये कही गयी है, वही यहाँ भी होनी चाहिये। कूट एवं कोष्ठ आदि सभी अङ्गों की संख्या पूर्व-वर्णित होनी चाहिये। महानीड की संख्या सोलह होनी चाहिये। इस देवालय की संज्ञा 'भद्रकूट' होती है।।४३-४५।। ✵ मनोहरम् ✵ तदेवान्यदलङ्कारं शालामध्ये सभद्रकम् ।।४६।। वृत्तग्रीवाशिरोयुक्तमेतन्नाम्ना मनोहरम् । मयं०-१८

२७४ मयमतम् यदि भवन के अलङ्करण भिन्न हों एवं शालाओं के मध्य में भद्रक हों, ग्रीवा एवं शिरोभाग गोलाई लिये हों तो इस देवालय का नाम 'मनोहर' होता है।।४६।। ❋ आवन्तिकम् ❋ तदेवान्यदलङ्कारं वेदास्त्रं कन्धरं शिरः ॥४७॥ नानामसूरकस्तम्भवेदिकाद्यैरलङ्कृतम् । नाम्नावन्तिकमित्युक्तं शम्भोर्मन्दिरमुत्तमम् ॥४८॥ यदि अलङ्करण भिन्न हों, कन्धर एवं शिरो-भाग चौकोर हों, विभिन्न प्रकार के मसूरक, स्तम्भ एवं वेदिका आदि से अलङ्कृत हों तो इस देवालय की संज्ञा 'आवन्तिक' होती है। यह भवन शिव-मन्दिर के लिये उपयुक्त होता है।।४७-४८।। ❋ सुखावहम् ❋ त्रिःसप्तहस्तविपुले चतुरंशनाली धर्मांशकेंऽशमभितो गृहपिण्डमानम्। अन्थारमंशमभितोंऽशकमङ्गहारं कूटं च नीडमथ कोष्ठकमंशतारम् ॥४९॥ शालायतं द्विगुणमंशकतारहारं वातायनैर्मकरतोरणकैर्विचित्रम् । त्यक्त्वा जलस्थलमुपर्यपि चाष्टभागे कूटं च नीडमथ कोष्ठकमंशतत्या ॥५०॥ यदि विस्तार इक्कीस हाथ हो तो उसके दश भाग करने चाहिये। चार भाग से नाली ( गर्भगृह ), एक भाग से चारो ओर भीतरी भित्ति की मोटाई, एक भाग से अन्धार, उसके चारो ओर एक भाग से हारामार्ग का विस्तार तथा एक भाग से कूट, नीड एवं कोष्ठक का विस्तार रखना चाहिये। शाला की लम्बाई चौड़ाई की दुगुनी होनी चाहिये। हारा-मार्ग की चौड़ाई एक भाग से रखनी चाहिये। वातायन ( खिड़की, झरोखा ) एवं मकर-तोरण से सज्जा करनी चाहिये। इसके ऊपरी भाग में जल-भाग को छोड़ कर आठ भाग करना चाहिये। कूट, नीड एवं कोष्ठक का विस्तार एक भाग से रखना चाहिये।।४९-५०।। शालायतं द्विगुणमूर्ध्वतले षडंशे सौष्ठ्यंशमंशविपुलं द्विगुणायतं स्यात् । कोष्ठं च नीडविपुलं हि तदर्थभागं चोर्ध्वं युगांशनयनांशकमध्यभद्रम् ॥५१॥

द्वाविंशोऽध्यायः 卐 चतुर्भूम्यादिबहुभूमिविधानम् २७५ शाला की लम्बाई चौड़ाई की दुगुनी होती है। उसके ऊपर (के तल के) छः भाग होते हैं। सौष्ठी की चौड़ाई एक भाग से एवं उसकी लम्बाई उसके दुगुनी होती है। कोष्ठ एवं नीड की चौड़ाई आधे भाग से होनी चाहिये। उसके ऊपर के (तल के) चार भाग होने चाहिये एवं दो भाग से मध्य-भद्र की रचना करनी चाहिये।।५१।। दण्डेन निर्गममुपर्यपि भद्रनीडं सार्धं द्विदण्डविपुलं गलनासिकं च। वृत्ताभकन्धरवितर्दिकमस्तकं स्या- दष्टार्धनासिकमदभ्रमथाल्पमष्टौ ।।५२।। दण्ड-प्रमाण से निर्गम होना चाहिये। इसके ऊपर भद्रनीड निर्मित होना चाहिये। गल एवं नासिक ढाई दण्ड चौड़ा होना चाहिये। कन्धर, वितर्दिक एवं मस्तक गोलाई लिये होना चाहिये। आठ अर्धनासिक एवं आठ अल्पनासिक होना चाहिये।।५२।। कूटं च नीडमथ कोष्ठकमुन्नतंस्था- दा

२७६ मयमतम् प्रस्तरं तलिपमञ्चवेदिकं कन्धरं शिखरकुम्भकं क्रमात्। पञ्चभौममुदितं विशालके नन्दपङ्क्तिभिरथेन्द्रियांशकैः ॥५७॥ पाँच तल के देवालय का विधान—पाँच तल के देवालय की ऊँचाई को अड़तालीस बराबर भागों में बाँटना चाहिये। पौने तीन भाग से कुट्टिम, साढ़े पाँच भाग से चरण (स्तम्भ, प्रथम तल की ऊँचाई), ढाई भाग से मञ्च, सवा पाँच भाग से पादक (स्तम्भ, द्वितीय तल की ऊँचाई), ढाई भाग से प्रस्तर, पाँच भाग से तलिप (तृतीय तल की ऊँचाई), सवा दो भाग से मञ्च, पौने पाँच भाग से अङ्घ्रि (स्तम्भ, चतुर्थ तल की ऊँचाई), दो भाग से प्रस्तर, सवा चार भाग से तलिप (स्तम्भ, पाँचवें तल की ऊँचाई) पौने दो भाग से मञ्च, एक भाग से वेदिका, दो भाग से कन्धर, सवा चार भाग से शिखर एवं दो भाग से कुम्भ की रचना करनी चाहिये। पाँच तल के देवालय की चौड़ाई को नौ, दश या ग्यारह बराबर भागों में बाँटना चाहिये। ✵ षडाद्यैकादशभूम्यन्तविधानम् ✵ उच्छ्रये तदधः षड्भिर्गुणांशैरङ्घ्रिकं तलम्। षड्भौममेवमुद्दिष्टं ताराभागं तथा भवेत् ॥५८॥ (पूर्ववर्णित पाँच तल से ऊपर तल में) निचले तल से ऊपर ऊँचाई में छः भाग से अङ्घ्रि (स्तम्भ, तल की ऊँचाई) एवं तीन भाग से तल (अधिष्ठान) निर्मित करना चाहिये। इसकी चौड़ाई पूर्ववर्णित नियम के अनुसार होनी चाहिये॥५८॥ तदधः सार्धषड्भागैः सपादगुणभागकैः। स्तम्भं मसूरकं कुर्यात्तारे रुद्रार्कभागतः ॥५९॥ सप्तभौममिदं प्रोक्तं विमानं सार्वदेशिकम्। (सातवें तल के लिये) निचले तल के ऊपर ऊँचाई में साढ़े छः भाग से स्तम्भ एवं मसूरक सवा तीन भाग से निर्मित करना चाहिये तथा विस्तार को ग्यारह या बारह भाग से रखना चाहिये। सात तल वाला यह विमान प्रत्येक स्थान एवं अवसर के लिये उपयुक्त होता है॥५९॥ तदधो मुनिभिः सार्धगुणांशैः स्तम्भकुट्टिमम् ॥६०॥ धर्मरुद्रार्कभागैस्तु सप्रयोदशभागिकैः। अष्टभौमं वदन्त्यस्मिन्नेवं प्राज्ञा मुनीश्वराः ॥६१॥ उसके ऊपरी तल में सात भाग से स्तम्भ एवं साढ़े तीन भाग से कुट्टिम रखना चाहिये। इसकी चौड़ाई को दश, ग्यारह, बारह या तेरह भाग में बाँटना चाहिये। आठ तल के मन्दिर के निर्माण के विषय में मुनियों का विचार इस प्रकार वर्णित है।

४. अध्याय २६-३६: मण्डप, प्राकार, परिवार-देवता मन्दिर एवं प्रतिष्ठा उपसंहार

द्वाविंशोऽध्यायः 卐 चतुर्भूम्यादिबहुभूमिविधानम् २७७ तदधः सार्धसप्तांशैः सत्रिपादगुणांशकैः । स्तम्भं च तलकं कुर्यात्तारेऽंशं तत्र पूर्ववत् ॥६२॥ एवं नवतलं प्रोक्तं दशभौममथोच्यते । उसके ऊपरी तल ( नौ तल ) में निचले तल से ऊपर साढ़े सात भाग से स्तम्भ एवं पौने चार भाग से तल ( अधिष्ठान ) बनाना चाहिये। तल का विस्तार पूर्ववत् होना चाहिये। इस प्रकार नौ तल का मन्दिर निर्मित होता है। अब दशवें तल का वर्णन किया जा रहा है॥६२॥ तदधोऽष्टयुगांशैस्तु पादं मसूरकं भवेत् ॥६३॥ तारे पूर्वोक्तभागैस्तु मनुभागैरथापि वा। (दसवें तल के लिये ) निचले तल के ऊपर आठ भाग से पाद ( स्तम्भ, तल की ऊँचाई ) एवं चार भाग से मसूरक होता है। चौड़ाई पूर्वोक्त रीति से या चौदह भाग में बाँटनी चाहिये॥६३॥ तदधः सार्धवस्वंशैः सपादयुगभागिकैः ॥६४॥ स्तम्भं मसूरकं कुर्यात्तारे तद्वच्च पक्षकैः । तथा द्विरष्टभागैस्तु सप्तदशांशकैस्तु वा ॥६५॥ एकादशतलं प्रोक्तं द्वादशं क्षममुच्यते । इसके ऊपरी तल ( ग्यारह तल ) में निचले तल के ऊपर साढ़े आठ भाग से स्तम्भ एवं सवा चार से मसूरक निर्मित करना चाहिये। चौड़ाई पूर्ववर्णित अथवा पन्द्रह, सोलह या सत्रह भागों में बाँटनी चाहिये। इस प्रकार ग्यारह तल का देवालय निर्मित होता है। अब बारह तल के देवालय का वर्णन किया जा रहा है॥६४-६५॥ ❋ द्वादशतलविधानम् ❋ तदधो नन्दनन्दार्धभागैः स्तम्भं मसूरकम् ॥६६॥ तारे द्विरष्टभागादि यावदर्कद्वयांशकम् । गृहपिण्ड्यलिन्द्रहारा गर्भागाराद्वहिः क्रमात् ॥६७॥ हर्म्यस्यावधिकं यावन्नीयते तावदंशकैः । द्वित्रिवेदैषु षड्भागैः प्रागुक्तांशैस्तु वा गृहम् ॥६८॥ बारह तल के देवालय का विधान—( बारह तल के देवालय के लिये ) निचले तल ( की भूमि ) के नौ भाग करने चाहिये। साढ़े चार भाग से मसूरक होने चाहिये। चौड़ाई को सोलह से चौबीस भागों में बाँटना चाहिये। गर्भगृह से लेकर भवन

२७८ मयमतम् की सीमा तक क्रमशः गृहपिण्ड ( भित्ति ), अलिन्द्र एवं हारामार्ग को उनके भाग के अनुसार रखना चाहिये। गर्भगृह दो, तीन, चार या छः भाग से या पूर्वोक्त भाग से निर्मित करना चाहिये।।६६-६८।। एकार्धेनाथवालिन्द्रं शेषं कुड्येषु योजयेत्। केचित् त्रिनवभिर्भागैर्वदन्ति द्वादशावनौ ।।६९।। षट्कुड्यं पञ्चसालिन्द्रं बहिः कूटादिशोभितम्। कूटं कोष्ठं च नीडं च क्षुद्रशालेभतुण्डकम् ।।७०।। अलिन्द्र की संरचना एक या डेढ़ भाग से करनी चाहिये एवं शेष भाग से भित्ति निर्मित होनी चाहिये। कुछ विद्वानों के अनुसार बारहवें तल के सत्ताईस भाग करने चाहिये। छः भाग से भित्ति एवं पाँच भाग से अलिन्द्र निर्मित होना चाहिये। बाहरी भाग में कूटादि से अलङ्करण होना चाहिये। वहाँ कूट, कोष्ठ, नीड, क्षुद्र-शाल एवं गज- शुण्ड निर्मित होना चाहिये।।६९-७०।। यथाशोभमलङ्कारं तथा युञ्जीत बुद्धिमान्। युग्महस्तैरयुग्मैर्वा योजयेदेवमिच्छया ।।७१।। इन अलङ्करणों को इस प्रकार निर्मित करना चाहिये, जिससे वे सुन्दर लगें। इन्हें सम-हस्तप्रमाण से या विषम-हस्तप्रमाण से निर्मित करना चाहिये।।७१।। युग्मांशे द्व्यंशकं वाऽपि कूटव्यासं द्विरायतम्। शालायाश्चतुरंशैर्वा युग्मे युग्मांशकैर्विदुः ।।७२।। नानाभागैरलङ्कारैरन्यैरुक्तं मुनीश्वरैः। तथा वा तत्र युञ्जीयात्प्राज्ञः शिल्पिषु बुद्धिमान् ।।७३।। यदि प्रमाण सम संख्या में हों तो कूट का व्यास दो भाग से एवं चौड़ाई उसके दुगुनी रखनी चाहिये। अथवा शाला (कूट) की चौड़ाई चार भाग से रखनी चाहिये। सम संख्या का माप होने पर सभी भागों का माप सम संख्या में होना चाहिये। श्रेष्ठ मुनियों ने विभिन्न भागों एवं अलङ्करणों का वर्णन किया है। बुद्धिमान शिल्पी को उन स्थानों पर उसी विधि से निर्माण करना चाहिये।।७२-७३।। ✺ खण्डहर्म्यम् ✺ तलमेकं भवेद् ग्रासं खण्डहर्म्यं चतुःस्थले। द्वितलं पञ्चषट्सप्तभूमावेव विधीयते ।।७४।। त्रितलं चाष्टभूमे तु नन्दपङ्क्तितले तथा। पञ्चभौमं चतुर्भौमं द्वादशैकादशे तले ।।७५।।