मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
पृष्ठ 288, कुल 395 में से
संदर्भ में पढ़ें२६४ मयमत्म् स्यान्नागरं द्राविडवेसरं च क्रमेण वै सत्त्वरजस्तमांसि। महीसुरोर्वीपतिवैश्यकास्ते हरिर्विधाता हर आधिदैवाः ॥९९॥ इति मयमते वास्तुशास्त्रे त्रिभूमिविधानो नामैकविंशोऽध्यायः इस प्रकार इनके (भवन के) तीन भेद—नागर, द्राविड एवं वेसर होते हैं, जो क्रमशः सत्त्व, रजस् एवं तमस् के प्रतीक हैं। ये (मनुष्यों में) ब्राह्मण, राजा (क्षत्रिय) एवं वैश्य के तथा (देवों में) हरि, विधाता एवं शिव के (भवन के लिये) अनुकूल होते हैं॥९९॥ व्याख्यात्मक टिप्पणी १. त्रिभूमि-विधान (तीन तल के भवन) का वर्णन शिल्परत्न (पूर्व.-३७.२७-४३) एवं मानसार (अ. २१) में प्राप्त होता है। २. पञ्जर (श्लोक ३) पञ्जर का वर्णन शिल्परत्न (पू.-२६ अ.) में इस प्रकार प्राप्त होता है— शालाकूटान्तरालं तद्द्वारान्तरमिति स्मृतम्। पञ्जरं तत्र कुर्वीत तदनेकविधं भवेत्॥१॥ दण्डैर्द्वित्रिचतुर्मितैर्मितवितानातानकं पञ्जरम् नासाद्युज्ज्वलितं च जालकमधो वेधूर्ध्वतः संस्थितम्। दण्डैर्द्व्यादियुगान्तिमैस्ततमतो दण्डर्द्धितं चायतम् कर्तव्यं द्विगुणान्तिमं सुषिरितं गोमूत्रिकादि क्रमात्॥२॥ पञ्जरं नासिकाकारं कूटकोष्ठाममेव वा। हस्तपृष्ठविमानस्य शिखराकृति वा पुनः॥३॥ इस प्रकार पञ्जर का विशद वर्णन पूरे अध्याय में वर्णित है। ३. स्तम्भतोरण (श्लोक २९-३३) स्तम्भतोरण का परिचय शिल्परत्न (पूर्व. अ. २३) में इस प्रकार प्राप्त होता है— स्तम्भे दिङ्नन्दनागांशिनि झषमनलांशेन शेषेण पादौ व्यासं स्तम्भार्धतोऽब्ध्याशुगरसमितदण्डेन वा तत्र कुर्यात्।