भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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पञ्चविंशोऽध्यायः 卐 मण्डपसभाविधानम् ३४३ कौशिक—दस अंशों वाला चौकोर मण्डप एक सौ बारह स्तम्भों से युक्त होता है। यह नौ कूटों से युक्त एवं एक भाग के अन्तराल से युक्त होता है। इसे 'कौशिक' कहते हैं। चतुष्कोण होने पर यह 'जातिक' होता है। यदि इसमें एक मुख (द्वार) एवं एक भद्र हो तो इसे 'नन्द' कहते हैं तथा दो मुख होने पर इसकी संज्ञा 'भद्रकौशिक' होती है। तीन मुख होने पर 'जयकोश' तथा चार मुख होने पर इसे 'पूर्णकोश' कहते हैं। यह अधिष्ठान, स्तम्भ एवं कोनों पर लाङ्गल के आकार की भित्ति से युक्त होता है। इसे अड़तालीस अल्पनासिकाओं एवं सभी अलङ्करणों से सुसज्जित करना चाहिये। ✵ कुलधारणम् ✵ एकादशविभागेन समं तु चतुरस्रकम् ॥८६॥ परितो मण्डपं तस्य बाह्ये भागेन कारयेत्। चतुष्कर्णे द्विभागेन चतुष्कूटसमन्वितम् ॥८७॥ कुलधारण—इसमें एक समचतुष्कोण क्षेत्र ग्यारह भाग से युक्त होता है। इसके चारो ओर एक भाग से मण्डप निर्मित होता है। चारो कोणों पर दो भाग से चार कूट होते हैं॥८६-८७॥ चतुर्दिग्द्वित्रिभक्त्या तु विपुलायतकोष्ठकम् । त्रिभक्तिचतुरस्रं तु मध्यरङ्गच्यूर्ध्वकूटकम् ॥८८॥ कूटशालान्तरे तस्य क्रकरीकृतमार्गकम् । जात्यादिमुखभद्राङ्गं सर्वावयवशोभितम् ॥८९॥ चारो दिशाओं में दो भाग चौड़ा एवं तीन भाग लम्बा कोष्ठ होना चाहिये। तीन भक्तिमाप का चौकोर मध्यरङ्ग एवं उसके ऊपर कूट होना चाहिये। कूट एवं शाला के बीच में क्रकरीकृत (क्रास के आकार में) मार्ग होने चाहिये। जाति आदि को मुखभद्र आदि सभी अंगों से युक्त होना चाहिये॥८८-८९॥ ऊर्ध्वे सभाग्रनीडाङ्गं प्रस्तरं नवबोधकम् । विवृतं संवृतं वापि गुह्यागुह्यार्थमाचरेत् ॥९०॥ कुलधारणमित्युक्तं समं तु चतुरस्रकम् । ऊपरी भाग में सभाग्र, नीड, प्रस्तर एवं नौ बोधक होना चाहिये। मण्डप ढका हुआ अथवा खुला हुआ गोपनीय अथवा खुले कार्य की आवश्यकता के अनुसार निर्मित किया जा सकता है। इस सम-चतुष्कोण मण्डप को कुलधारण कहते हैं। ✵ सुखाङ्गम् ✵ भागैर्द्वादशभिर्युक्तं समं तु चतुरस्रकम् ॥९१॥