मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४२ मयमतम् तदेव जलपादं तु ब्रह्मस्थलमितीष्यते । परितो वारमेकांशं द्व्यंशेनावृतमण्डपम् ॥७८॥ पूर्ववन्मुखभद्रं स्यादिष्टदिग्गतभद्रकम् । ब्रह्मस्थाने विधातव्यं ग्रामादीनां सनातनम् ॥७९॥ इसके ब्रह्मस्थल ( केन्द्रभाग में ) जलपाद ( जल का स्थान ) हो सकता है, जिसके चारो ओर एक भाग से पैदल चलने का मार्ग हो एवं दो भाग से ढँका हुआ मण्डप निर्मित हो। मुखभद्र पूर्व-वर्णित रीति से हो एवं अभीप्सित दिशा में भद्रक निर्मित हों। इसे ग्राम आदि के ब्रह्मस्थान ( केन्द्र ) में निर्मित करना चाहिये ॥७८-७९॥ दर्भम् नवभक्तियुतं सम्यक् पङ्क्तिपङ्क्त्यङ्घ्रिकान्वितम् । त्र्यंशैकविस्तृतं भद्रं चतुर्द्वारसमन्वितम् ॥८०॥ सोपानं प्रमुखे तस्य कर्णे लाङ्गलभित्तिकम् । नवरङ्गैरलङ्कुर्यात् षडष्टैवाल्पनासिकम् ॥८१॥ नवब्रह्म सुपूज्यं तद् ग्रामवेश्मादिमध्यगम् । सर्वालङ्कारसंयुक्तं दर्भाख्यं तन्मनोहरम् ॥८२॥ दर्भ—यह मण्डप नौ भक्तिप्रमाण का एवं एक सौ स्तम्भों से युक्त होता है। इसका भद्र तीन भाग विस्तृत ( तथा एक भाग से निर्गमयुक्त ) एवं चार द्वारों से युक्त होता है, जो सोपान से युक्त होते हैं। उसके कोनों में लाङ्गल के आकार की भित्ति होती है। इसे नौ रंगों से तथा अड़तालीस अल्पनासियों से सुसज्जित करना चाहिये। यह नौ ब्रह्माओं ( ब्रह्मा के नौ ऋषिपुत्रों ) से पूजित एवं ग्राम तथा भवन आदि के मध्य में होता है। सभी अलंकारों से युक्त दर्भसंज्ञक मण्डप अत्यन्त सुन्दर होता है। ✺ कौशिकम् ✺ दशांशचतुरस्त्राभं सद्वादशशताङ्घ्रिकम् । नवकूटसमायुक्तमेकैकांशान्तरालकम् ॥८३॥ एतत् कौशिकमित्युक्तं चतुरस्रं तु जातिकम् । नन्दमेकानने भद्रं द्विमुखं भद्रकौशिकम् ॥८४॥ त्रिमुखं जयकोशं स्यात् पूर्णकोशं चतुर्मुखम् । अधिष्ठानाङ्घ्रिवत् कर्णे लाङ्गलाकारभित्तिकम् ॥८५॥ सर्वालङ्कारसंयुक्तं षडष्टैवाल्पनासिकम् ।