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मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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पञ्चविंशोऽध्यायः 卐 मण्डपसभाविधानम् ३४१ एवं कूट होते हैं। यह दो भक्ति विस्तृत होता है एवं एक भाग से वक्रनिष्क्रान्त निर्मित होता है। इसमें मध्य भाग को छोड़कर साठ स्तम्भ, चौबीस नासियाँ होती हैं एवं यह सभी अलङ्कारों से सुसज्जित होता है। शिव नामक यह मण्डप सभी भवनों के लिये सदा उपयुक्त होता है।।७०-७१।। ✺ वेदम् ✺ सप्तांशचतुरस्राभं षष्ट्यङ्घ्रिसमावृतम् ।।७२।। नवभागेन तन्मध्ये कूटं वा मण्डिताङ्गणम्। सद्धात्रिंशतिनास्यङ्गं चतुर्दिशि सवारणम् ।।७३।। वेद—यह चौकोर एवं सात भाग से युक्त होता है। यह साठ स्तम्भों से युक्त होता है। उसके मध्य में नौ भाग से आँगन हो, जो कूट से अलंकृत हो ( अथवा खुला हो ) सकता है। इसमें बत्तीस नासियाँ एवं चारो दिशाओं में वारण होता है। त्रिभागैकांशविस्तारनिर्गमं मुखभद्रकम्। मध्यरङ्गसमोपेतमिष्टदिग्गतभित्तिकम् ।।७४।। आस्थानमण्डपं चैत्तैतिलानां महीभृताम्। अभिषेकादिकार्येषु योग्यं वेदमिति स्मृतम् ।।७५।। इस मण्डप को तीन भाग के माप वाले मुखभद्रक ( सामने पोर्च ) से युक्त करना चाहिये, जिसमें एक भाग से निर्गम निर्मित हो। इसे मध्य रङ्ग से युक्त एवं इच्छित दिशा में भित्ति से युक्त होना चाहिये। यह देवों एवं राजाओं का आस्थान मण्डप ( जहाँ श्रोता-दर्शक बैठते हैं ) है एवं अभिषेक आदि कार्यों के लिये उपयुक्त होता है। इसे वेद ( मण्डप ) कहा गया है।।७४-७५।। ✺ अलङ्कृतम् ✺ अष्टभक्त्या युगास्रं स्यादशीतिपादसंयुतम्। चतुर्भागोर्ध्वकूटं तु द्विभागेन तु भद्रकम् ।।७६।। चतुर्दिशि चतुर्द्वारं पार्श्वे सोपानसंयुतम्। सर्वालङ्कारसंयुक्तमलङ्कृतमिति स्मृतम् ।।७७।। अलंकृत—यह मण्डप चौकोर, आठ भक्तियुक्त एवं अस्सी स्तम्भों से युक्त होता है। इसमें चार भाग से ऊर्ध्वकूट एवं दो भागों से भद्रक निर्मित होना चाहिये। चारो दिशाओं में चार द्वार एवं बगल में सीढ़ी होनी चाहिये। सभी अलंकारों से युक्त इस मण्डप को अलंकृत कहा गया है।।७६-७७।।