मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४० मयमतम् इस मण्डप की संज्ञा पद्म है। देवालय के सम्मुख यह मण्डप देवों के अभिषेक के लिये प्रशस्त होता है। यह एक मुख वाला हो तो मध्य में आँगन होना चाहिये। यह यज्ञकार्य के अनुकूल होता है एवं आठों दिशाओं में वारण ( किसी भी दिशा में ) हो सकता है।।६३-६५।। ✺ भद्रकम् ✺ भद्रकं पञ्चभागेन चतुरस्रसमाकृति । मध्ये कूटं त्रिभागेन परितोऽशेन मण्डपम् ।।६६ ।। द्वात्रिंशत्पादसंयुक्तं चतुर्विंशतिनासिकम् । पञ्जरैरष्टभिर्युक्तं कुड्यं कुम्भलतान्वितम् ।।६७।। भद्रक—भद्रक मण्डप चौकोर होता है एवं इसका माप पाँच भाग रक्खा जाता है। मध्य भाग में तीन भाग से कूट एवं चारो ओर एक भाग से मण्डप निर्मित होता है। यह बत्ती स्तम्भों एवं चौबीस नासिकाओं से युक्त तथा आठ पञ्जरों से युक्त होता है। भित्ति कुम्भलता से सुसज्जित होती है।।६६-६७।। चतुर्दिक्षु चतुर्द्वारं कर्णे लाङ्गलभित्तिकम् । मध्यमेऽङ्गणयुक्तं वा त्रिभक्त्या विस्तृताङ्घ्रिकम् ।।६८।। धाम्नः स्थलसमं तस्य पङ्क्त्यष्टांशोनमेव वा । नृत्तमण्डपमेतत् स्यात् स्नानार्थं वा तदेव हि ।।६९।। चारो दिशाओं में चार द्वार एवं कोनों पर लाङ्गलभित्ति ( हल के आकार की भित्ति ) होनी चाहिये। अथवा मध्य भाग में आँगन हो एवं तीन भक्ति ( तीन ईकाई ) विस्तार वाले स्तम्भों से युक्त रखना चाहिये। मण्डप को भवन के सतह के बराबर; दस या आठ भाग कम रखना चाहिये। यह मण्डप ( देवादिकों के ) स्नान के लिये एवं नृत्य के लिये अनुकूल होता है।।६८-६९।। ✺ शिवम् ✺ षड्भक्ति चतुरस्राभं मध्येऽष्टस्तम्भकूटकम् । द्विभक्तिविस्तृतं चैकभक्त्या निष्क्रान्तवक्त्रकम् ।।७०।। षष्ट्यङ्घ्रिकसमायुक्तं त्यक्तमध्यस्थपादकम् । चतुर्विंशतिनास्यङ्गं सर्वालङ्कारसंयुतम् ।।७१।। शिवाख्यं मण्डपं सर्ववासे योग्यं सनातनम् । शिव-मण्डप—यह छः भक्ति वाला चौकोर मण्डप होता है। इसमें आठ स्तम्भ