मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चविंशोऽध्यायः 卐 मण्डपसभाविधानम् ३३९ एकद्वित्रिगुणस्तम्भव्यासं मध्ये तु भद्रकम्। तोरणाढ्यं सुरोपेतसर्वावयवशोभितम् ॥५९॥ मण्डप के मध्य में भद्रक (पोर्च) निर्मित करना चाहिये, जिसका व्यास स्तम्भ के व्यास का एक गुना (बराबर), दुगुना या तीन गुना रखना चाहिये। इसे तोरण से युक्त, सभी अंगों एवं देवों की आकृतियों से युक्त निर्मित करना चाहिये ॥५९॥ धाम्नस्तु भित्तिविष्कम्भसमं वार्धार्धहीनकम्। त्रिभागैकविहीनं तद्भित्तिविष्कम्भमिष्यते ॥६०॥ सान्तरालं सवेशं च सर्वेषां सद्मनां मुखे । मण्डप की भित्ति का विष्कम्भ (मोटाई) प्रधान भवन (या देवालय) की मोटाई के बराबर तीन चौथाई अथवा तीन में दो भाग के बराबर होना चाहिये। यह सभी भवनों के सम्मुख अन्तराल (मार्ग) से युक्त एवं वेश (आच्छादित स्थल) से युक्त होना चाहिये ॥६०॥ ✵ पद्मकम् ✵ चतुरस्रं चतुर्भक्त्या चतुर्द्वारसमन्वितम् ॥६१॥ मुखेऽमुखे द्विभक्त्यैकभक्त्या विस्तारनिर्गमम् । मध्यमस्तम्भकं त्यक्त्वैवोर्ध्वकूटं द्विभक्तिकम् ॥६२॥ पद्मक—चौकोर क्षेत्र को चार भक्ति (इकाई माप) एवं चार द्वार से युक्त करना चाहिये। मुखभाग एवं पृष्ठभाग पर दो भक्ति एवं एक भाग से निर्गम का विस्तार रखना चाहिये। मध्य भाग में स्तम्भ नहीं होना चाहिये एवं दो भक्ति से ऊर्ध्वकूट का निर्माण करना चाहिये॥६१-६२॥ षट्त्रिंशत्पादसंयुक्तं चतुस्सप्ताल्पनासिकम् । सोपानं स्याच्चतुर्दिक्षु लाङ्गलाकारभित्तिकम् ॥६३॥ पञ्जरैरष्टभिर्युक्तं पद्मकं पद्मकप्रभम् । स्नानार्थं तैतिलानां तु प्रासादाभिमुखे मतम् ॥६४॥ तदेवैकाननोपेतं मध्याङ्गणसमन्वितम् । यागादिकर्मयोग्यं स्याद्दिष्टतो दिशि वारणम् ॥६५॥ इसमें तिरेसठ स्तम्भ तथा अट्ठाईस अल्पनासिकायें (छोटी सजावटी खिड़कियाँ) होनी चाहिये। चारों दिशाओं में सोपान होने चाहिये एवं लाङ्गल के आकार की भित्ति होनी चाहिये। आठ पञ्जर (सजावटी अंग) होने चाहिये। पद्मक (कमलपुष्प के समान)