भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

पृष्ठ 362, कुल 395 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 362

३३८ मयमतम् ✵ पञ्चास्रकुण्डम् ✵ व्यासे सप्तांशेंड'शकं न्यस्य बाह्ये वृत्तं भ्राम्यं क्षेत्रतारे युगांशे । पट्टायामं त्रिप्रभागैरनेन पञ्चास्रं स्यात् पञ्चसूत्रप्रयोगात् ॥५४॥ पञ्चकोण कुण्ड—कुण्ड के क्षेत्र को सात भागों में बाँटना चाहिये एवं उसमें एक वृत्त इस प्रकार खींचना चाहिये, जिससे उसका एक भाग बाहर रहे। पाँच सूत्रों के द्वारा पञ्चकोण कुण्ड बनाना चाहिये, जिससे पट्ट का आयाम चतुष्कोण का तीन चौथाई हो।।५४।। तत्तद्द्वेयोपात्तभागेषु तत्तद्भागं कृत्वा प्रागिवैकैकभागे । न्यूनाधिक्येनास्त्रनाहस्य तुल्यं युक्त्या धीमान् योजयेत्सर्वकुण्डम् ॥५५॥ प्राप्त भागों के उतने भाग करके पहले के समान एक-एक भाग कम या अधिक करते हुये कोणों को परिधि के बराबर निर्मित करना चाहिये। इस प्रकार बुद्धिमान स्थपति को सभी प्रकार के कुण्डों की योजना करनी चाहिये।।५५।। भूते साङ्घ्रित्रिबीजं मुनिषु च नयनं षोडशेष्वांशयुक्तं सत्र्यङ्घ्येकं नवांशे शिवपदविहिते सार्धकं सैकभानौ । साङ्घ्येकं बीजमेवोदितमथ तिथिके षोडशांशैकहीनं सप्ताधिक्ये दशांशे नवदशपदकेऽष्टांशहीनं क्रमेण ॥५६॥ पाँच में तीन चतुर्थांशयुक्त एक भाग, सात में दो भाग, सोलह में पाँच भाग, नौ में तीन चतुर्थांशयुक्त एक भाग, ग्यारह में डेढ़ भाग, तेरह में सवा एक भाग कहा गया है। पन्द्रह में एक भाग कम एवं सोलह भाग, सत्रह भाग तथा उन्नीस भाग में क्रमशः आठ भाग कम होना चाहिये।।५६।। ✵ सिद्धम् ✵ तदेव धाम्नामग्रे तु कर्तव्यं चेन्मसूरकम् ॥५७॥ स्तम्भप्रस्तरवर्गं च प्रासादाङ्गसमं मतम् । एकद्विद्वारयुक्तं वा कुड्यं कुम्भलतान्वितम् ॥५८॥ सिद्धमण्डप—यदि सिद्ध मण्डप को देवालय के सम्मुख स्थापित किया जाय तो उसमें अधिष्ठान, स्तम्भ, प्रस्तर एवं वर्ग देवालय के अंग के समान होने चाहिये। यह एक, दो या तीन द्वारों से युक्त हो एवं भित्ति पर कुम्भलता का अंकन होना चाहिये।।५७-५८।।