मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चविंशोऽध्यायः 卐 मण्डपसभाविधानम् ३३७ मत्स्यं कृत्वा युग्मयुग्मं द्विपाश्र्वात् षट्कोणं स्यात्पातयेत्सूत्रषट्कम् ॥५०॥ छः कोण का कुण्ड—( चतुष्कोण ) कुण्ड के क्षेत्र को पाँच भागों में बाँटना चाहिये। एक वृत्त इस प्रकार खींचना चाहिये, जिससे उसकी परिधि उन पाँच भागों से अधिक हो। इसके पश्चात् प्रत्येक भाग में मत्स्य की आकृति निर्मित करनी चाहिये। इस प्रकार छः सूत्रों के द्वारा षट्कोण कुण्ड निर्मित होता है॥५०॥ ✺ पद्मकुण्डम् ✺ वृत्तं कृत्वा पूर्ववत्तस्य मध्ये वृत्तं भ्राम्यं यत्र यन्मध्यतस्तत् । पद्मस्याकारं यथा कर्णिकादीन् कुर्याद्विद्वान् पद्मकुण्डं क्रमेण ॥५१॥ पद्माकार कुण्ड—पूर्ववर्णित विधि से वृत्त बनाकर उसके मध्य में एक वृत्त निर्मित करना चाहिये। इसके पश्चात् मध्य से प्रारम्भ करते हुये पद्म का आकार एवं कर्णिका आदि जिस प्रकार बनें, उस प्रकार विद्वान् को पद्मकुण्ड निर्मित करना चाहिये। ✺ अष्टास्रकुण्डम् ✺ क्षेत्रव्यासे षट्चतुर्भागिकेऽस्मिन् भागं बाह्ये न्यस्य सूत्रं समन्तात् । कोणस्यार्धं कोणकाभ्यां तु लेख्यं ह्यष्टास्रंस्यादष्टसूत्रप्रयोगात् ॥५२॥ अष्टकोण कुण्ड—कुण्ड के क्षेत्र को चौबीस भागों में बाँटना चाहिये। एक भाग बाहर रहे, इस प्रकार एक वृत्त खींचना चाहिये। दोनों कोणों से एवं कोणों के अर्ध भाग से आठ सूत्रों ( रेखाओं ) से अष्टकोण कुण्ड निर्मित करना चाहिये॥५२॥ ✺ सप्तास्रकुण्डम् ✺ तारे पङ्क्त्यंशेंऽशकं न्यस्य बाह्ये वृत्तं भ्राम्यं क्षेत्रकेऽष्टाष्टभागे । सैकैर्वेद्राष्टांशकैः पट्टदैर्घ्यं सप्तास्रं स्यात् सप्तसूत्रप्रयोगात् ॥५३॥ सप्तकोण कुण्ड—कुण्ड के क्षेत्र को दस भागों में बाँटना चाहिये। उसमें एक वृत्त इस प्रकार खींचना चाहिये, जिससे एक भाग क्षेत्र के बाहर रहे। सात सूत्रों के प्रयोग से सप्तकोण कुण्ड निर्मित होता है, जिसका पट्टदैर्घ्य ( सातों कोणों का माप ) तैंतीस हो एवं क्षेत्र का माप चौंसठ हो॥५३॥ मय०-२२