भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

पृष्ठ 360, कुल 395 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 360

३३६ मयमतम् कोणं यावद् भ्रामयेत्तद्वदन्यद् योन्याकारं स्याद् द्विसूत्रप्रयोगात् ॥४७॥ योनि की आकृति का कुण्ड—कुण्ड के पूर्व भाग को पाँच भागों में बाँटना चाहिये। कोण से आधा भाग ग्रहण कर ( सीधी रेखा द्वारा उत्तर एवं दक्षिण के ) मध्य भाग को जोड़ना चाहिये। इसके पश्चात् ( उत्तर, पश्चिम ) कोण को गोलाई से घेरना चाहिये। इसी प्रकार दूसरी ओर भी करना चाहिये अर्थात् दक्षिण-पश्चिम के कोण को भी गोलाई से घेरना चाहिये। इस प्रकार दो सूत्रों के प्रयोग से योनि की आकृति निष्पन्न होती है।।४७।। ✵ अर्धचन्द्रकुण्डम् ✵ व्यासे धर्मांशेंऽशमूर्ध्वार्धधस्तान्नीत्वैव ज्यासूत्रकं पातयित्वा । तन्मानेन भ्रामयेदर्धचन्द्रं कुण्डं युक्त्या वास्तुविद्याविधिज्ञैः ॥४८॥ अर्धचन्द्राकार कुण्ड—कुण्ड के व्यास के दसवें भाग में ऊपर एवं नीचे ( बिन्दु बनाना चाहिये। उस बिन्दु से ) ज्यासूत्र ( सीधी रेखा ) खींचना चाहिये। इस मान से [L