मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चविंशोऽध्यायः 卐 मण्डपसभाविधानम् ३३५ बाँटना चाहिये। मध्य के नौ भागों में वेदी होती है। चारो ओर तीन भाग छोड़कर मध्य में चौकोर, योनि के आकार का, अर्धचन्द्राकार, त्रिकोण, वृत्ताकार, षट्कोण, पद्मपुष्प के आकार का या अष्टकोण कुण्ड पूर्व दिशा से प्रारम्भ करते हुये निर्मित करना चाहिये।।४२।। ⁕ कुण्डलक्षणम् ⁕ हस्तविस्तृतनिखातवच्चतुष्कोटिकं दिशि दिशि त्रिसूत्रकम्। सत्रिमेखलमथ द्विकं तु वा धातुभूतगुणमात्रकोन्नतम् ।।४३।। कुण्ड का लक्षण— (कुण्ड के लिये) एक हाथ चौड़ा तथा एक हाथ गहरा चौकोर गड्ढा निर्मित करना चाहिये। यदि इसे तीन मेखला से युक्त करना हो तो तीन सूत्र या दो मेखला से युक्त करना हो तो दो सूत्र खींचना चाहिये। इन मेखलाओं की ऊँचाई सात, पाँच या तीन अंगुल रखनी चाहिये।।४३।। व्यासमब्ध्यनलपक्षमात्रकैर्योनिमूर्ध्वत इभोष्ठवत् कुरु। तारदैर्घ्यकसमुद्गमं चतुःषण्मनोऽङ्गुलिभिरग्निसम्मुखम् ।।४४।। उपर्युक्त मेखलाओं की चौड़ाई क्रमशः चार, तीन एवं दो अंगुल रखनी चाहिये। योनि की आकृति गज के ओष्ठ के समान निर्मित करना चाहिये। इसकी चौड़ाई, लम्बाई एवं गहराई क्रमशः चार, छः एवं एक अंगुल रखनी चाहिये तथा इसे अग्नि की ओर होना चाहिये।।४४।। वेदबन्धनयनाङ्गुलोन्नतव्यासमेखलयुतं तु वा पुनः। तालगाढमथवैकमेखलं सर्वकुण्डमकर्णयोनिकम् ।।४५।। कुण्ड के मेखलाओं की ऊँचाई चार, तीन या दो अंगुल होनी चाहिये। अथवा कुण्ड की गहराई एक बित्ता हो एवं एक मेखला से युक्त हो। सभी कुण्डों की योनि कोने में नहीं होनी चाहिये।।४५।। वृत्तसन्निभमथो तदाकृतिं वा युगेषुरसमात्रवैपुलम्। व्यासवेदगुणभागतुङ्गकं नाभिमब्जमिव कुण्डमध्यमे ।।४६।। कुण्ड का केन्द्र (नाभि) कमल के समान होना चाहिये। इसकी आकृति वृत्त के समान होनी चाहिये। इसका व्यास चार, पाँच या छः अंगुल होना चाहिये तथा इसकी ऊँचाई चार या तीन भाग होनी चाहिये।।४६।। ⁕ योनिकुण्डम् ⁕ न्यस्यैकांशं पञ्चभागे पुरस्तात् कोणस्याधार्धं गृहीत्वा ततस्तत्।