मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३३४ मयमतम् का तथा आठ नासिकाओं से युक्त होता है। इसे ब्रह्मासन कहा गया है।।३६।। ✺ विजयम् ✺ द्विभक्तिचतुरस्रं तु विजयं नाम मण्डपम् ।।३७।। अष्टपादसमायुक्तमष्टनास्या विभूषितम्। अधिष्ठानादिवर्गाढ्यं त्यक्तमध्यस्थपादकम् ।।३८।। नवपादसमायुक्ता प्रपा कल्याणकारिता। विजय—विजय संज्ञक मण्डप दो भक्ति से युक्त एवं चतुष्कोण होता है। यह आठ स्तम्भों एवं आठ नासियों से अलंकृत होता है। यह अधिष्ठान से युक्त एवं मध्य स्तम्भ से रहित होता है। विवाह के लिये नौ स्तम्भों से युक्त प्रपा निर्मित होनी चाहिये।।३७-३८।। ✺ सिद्धम् ✺ त्रिभक्ति चतुरस्रं तु षोडशस्तम्भसंयुतम् ।।३९।। नासिकाभिर्द्विरष्टाभिर्युक्तं मध्येऽङ्गणान्वितम्। मध्योर्ध्वकूटयुक्तं वा चतुर्द्वारसमन्वितम् ।।४०।। चतुर्दिक्षु बहिद्वारि चतुस्तोरणभूषितम्। यागादिकर्मयोग्यं स्याद्देवद्विजमहीभृताम्। नाम्ना सिद्धमिति प्रोक्तं सर्वकर्मसु पूजितम् ।।४१।। सिद्ध—सिद्ध संज्ञक मण्डप तीन भक्ति ( प्रमाण की इकाई ) वाला, चतुष्कोण, सोलह स्तम्भ से युक्त, सोलह नासिकाओं से युक्त एवं मध्य में आँगन से युक्त होना चाहिये, जिसके ऊपर मध्य भाग में कूट हो सकता है। चारो दिशाओं में चार द्वार हों। बाहरी द्वारों को चार तोरणों से अलंकृत करना चाहिये। यह मण्डप देवों, ब्राह्मणों एवं राजाओं के यज्ञ-कार्य के अनुकूल होता है। यह सिद्ध नामक मण्डप सभी कार्यों के अनुकूल कहा गया है।।३९-४१।। ✺ यागमण्डपम् ✺ कृत्वैकाशीतिभागान् निशितविपुलधीर्मण्डपाभ्यन्तरं त- न्मध्ये वेदी नवांशा भवति हि परितस्त्रीणि भागानि मध्ये। अस्रं योन्यर्धचन्द्रं गुणभुजमपरं वै सुवृत्तं षडस्रं पद्मं वस्वश्रकुण्डं सुरपतिभवनादिक्रमेणैव कुर्यात् ।।४२।। यज्ञमण्डप—बुद्धिमान् स्थपति को मण्डप के भीतरी भाग को इक्यासी भागों में