मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
पृष्ठ 357, कुल 395 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चविंशोऽध्यायः 卐 मण्डपसभाविधानम् ३३३ स्तम्भोत्सेधचतुर्भागे भागेनैव मसूरकम्। द्विभागं तलिपायामं भागेन प्रस्तरं भवेत् ॥३१॥ रङ्ग का लक्षण—( पूर्ववर्णित भाग के बराबर ) वेदिका की ऊँचाई होनी चाहिये। एक भाग से मध्य भाग में रङ्ग निर्मित करना चाहिये। स्तम्भ की ऊँचाई के चार भाग करने पर एक भाग से मसूरक ( अधिष्ठान ), दो भाग से स्तम्भ की लम्बाई एवं एक भाग से प्रस्तर निर्मित करना चाहिये।।३०-३१।। युग्मायुग्मद्विभक्त्यैकभक्त्या वा तद्विशालकम्। अष्टस्तम्भसमायुक्तं चतुःस्तम्भान्वितं तु वा ॥३२॥ प्रपादीनां तु संस्थानं यथा वा रङ्गमीरितम्। भवन-योजना सम संख्या में हो या विषम संख्या में हो, रङ्ग की विशालता दो भाग या एक भाग रखनी चाहिये। आठ स्तम्भों से युक्त अथवा चार स्तम्भों से युक्त रङ्ग का निर्माण प्रपा आदि के समान करना चाहिये।।३२।। सर्वावयवसंयुक्तं मिश्रद्रव्यसमन्वितम् ॥३३॥ शालासभाप्रपाणां तु मण्डपानां तु मध्यमे। प्रतिष्ठितचतुःस्थानं त्रिमानं रङ्गमिष्यते ॥३४॥ रङ्ग सभी अंगों से युक्त एवं मिश्रित पदार्थों से युक्त होता है। शाला, सभागार, प्रपा एवं मण्डपों के मध्य में—इन चार स्थलों पर रङ्ग का निर्माण होता है। इसका मान तीन प्रकार का कहा गया है।।३३-३४।। ✺ मालिकामण्डपम् ✺ मण्डपोपरि भूमिस्तु मालिकामण्डपं भवेत्। मण्डपोर्ध्वे सशिखरं द्वितलं यदि सम्भवम् ॥३५॥ मध्यस्थभूमिदेशत्वात् प्रतिमध्यं तदुच्यते। मालिका-मण्डप—मण्डप के ऊपर का तल मालिका मण्डप होता है। यदि मण्डप के दो तल हों तो वह शिखरयुक्त होता है। दोनों तलों के मध्य में स्थित भाग को प्रतिमध्य कहते हैं।।३५।। ✺ मेरुकम् ✺ मेरुकं चतुरस्रं स्याच्चतुष्पादेकभक्तिकम् ॥३६॥ नासिकाष्टकसंयुक्तं ब्रह्मासनमिति स्मृतम्। मेरुक—मेरुक मण्डप चौकोर, चार स्तम्भों से युक्त, एक भाग (भक्ति) माप