मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३३२ मयमतम् मण्डप का लक्षण—अधिष्ठान, उसके ऊपर स्तम्भ एवं प्रस्तर—इन तीन वर्गों से युक्त, कपोत एवं प्रति से युक्त निर्माण को मण्डप कहा जाता है॥२५॥ ❋ मण्डपशब्दार्थः ❋ मण्डं सुभूषणं तं पातीति मण्डपमिष्यते । मण्डप शब्द का अर्थ—मण्ड अर्थात् अलङ्करण। उसकी जो रक्षा करता है, उसे मण्डप कहते हैं। ❋ प्रपालक्षणम् ❋ सामान्यं सर्ववर्णानां प्रपारूपं वदाम्यहम् ॥२६॥ प्रपारूपाङ्गपादान्ते चोत्तरादूर्ध्ववंशकम् । प्राग्वंशमनुवंशं च नालिकेरदलादिभिः ॥२७॥ अन्यैरपि तथा पत्रैर्द्रव्यैः प्रच्छादिता प्रपा । प्रपा का लक्षण—सभी वर्णों के अनुकूल प्रपा के सामान्य स्वरूप का वर्णन करता हूँ। इसके स्तम्भ भूतल से प्रारम्भ होते हैं एवं इनके ऊपर उत्तर होते हैं। उत्तर ( स्तम्भ के ऊपर भित्ति ), उसके ऊपर ऊर्ध्ववंश ( प्रधान वंश, छाजन के लट्ठे ) होते हैं। इनके साथ प्राग्वंश ( प्रधान वंश से जुड़े पूर्व की ओर जाने वाले वंश ), अनुवंश ( सहायक वंश ) आदि होते हैं। प्रपा का आच्छादन नारियल के पत्ते तथा अन्य पत्तों से किया जाता है।।२६- २७।। प्राग्वदेवाङ्घ्रिकायामं चतुःषडष्टदशाङ्गुलम् ॥२८॥ पादविष्कम्भमेतेषां प्रमाणं सारदारुजम् । त्वक्सारं च यथालाभं तथा तत्र प्रयोजयेत् ॥२९॥ स्तम्भों की लम्बाई पूर्ववर्णन के अनुसार रखनी चाहिये। स्तम्भ का विष्कम्भ ( स्तम्भ का घेरा ) चार, छः, आठ यां दस अंगुल होना चाहिये। यह मान सारदारु ( ठोस काष्ठ ) से निर्मित स्तम्भ का कहा गया है। वंश-निर्मित स्तम्भ का मान भी यही है। जहाँ जैसी आवश्यकता हो, वहाँ वैसा निर्माण करना चाहिये।।२८-२९।। पादोच्चे पङ्क्तिनन्दाष्टसप्तषट्पञ्चभागिके । स्तम्भ की ऊँचाई के दस, नौ, आठ, सात, छः या पाँच भाग करना चाहिये। ❋ रङ्गलक्षणम् ❋ वेदिकोच्चं तु भागेन मध्ये रङ्गं प्रयोजयेत् ॥३०॥