भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

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पञ्चविंशोऽध्यायः 卐 मण्डपसभाविधानम् ३३१ मूलतारं तु भागेन तत्तद्भागोनमग्रतः । स्तम्भ का विस्तार ( घेरा ) आठ अंगुल से प्रारम्भ कर आधा अंगुल बढ़ाते हुये उन्नीस अंगुल तक ले जाना चाहिये। इस स्तम्भ के मूल का विस्तार प्राप्त करने के लिये उसकी ऊँचाई के ग्यारह, दस, नौ या आठ भाग करने चाहिये एवं उसमें से एक कम करने पर ( दस, नौ, आठ, सात भाग ) मूल के विस्तार या परिधि का होता है ।।१८-१९।। ✹ अधिष्ठानोत्सेधः ✹ पादोच्चार्धमधिष्ठानं सामान्यं सर्ववस्तुषु ॥२०॥ पादोच्चे पञ्चभागे तु द्विभागोच्चं तु वा तलम् । स्तम्भोत्सेधत्रिभागैकं वा मसूरकतुङ्गकम् ॥२१॥ अधिष्ठान की ऊँचाई—सामान्यतया सभी वास्तुओं में स्तम्भ की ऊँचाई के आधे प्रमाण से अधिष्ठान का मान रक्खा जाता है। अथवा स्तम्भ की ऊँचाई के पाँच भाग करने पर अधिष्ठान दो भाग के बराबर रक्खा जाता है या स्तम्भ की ऊँचाई के तीन भाग करने पर एक भाग के बराबर अधिष्ठान रक्खा जाता है।।२०-२१।। ✹ उपपीठोत्सेधः ✹ सोपपीठमधिष्ठानं केवलं वा मसूरकम् । अधिष्ठानसमोच्चं वा द्विगुणं त्रिगुणं तु वा ॥२२॥ उपपीठविधाने तु यदुक्तं तेन वोन्नतम् । उपपीठसमुत्सेधं यथायुक्ति यथारुचि ॥२३॥ उपपीठतलस्तम्भप्रस्तरालंकृतिक्रमम् । प्राग्वदेव समुद्दिष्टं शेषं युक्त्या समाचरेत् ॥२४॥ उपपीठ की ऊँचाई—अधिष्ठान उपपीठ से युक्त या केवल अधिष्ठान ( उपपीठरहित अधिष्ठान ) होना चाहिये। उपपीठ ऊँचाई में अधिष्ठान के बराबर, उसका दुगुना या तीन गुना होता है। अथवा उसकी ऊँचाई उसी प्रकार रखनी चाहिये, जैसी उपपीठ- विधान के प्रसंग में वर्णित है। उपपीठ की ऊँचाई इच्छानुसार या आवश्यकतानुसार रखनी चाहिये। उपपीठ, तल ( अधिष्ठान ), स्तम्भ एवं प्रस्तर की सज्जा के विषय में पहले कहा जा चुका है। शेष यथावसर करना चाहिये।।२२-२४।। ✹ मण्डपलक्षणम् ✹ अधिष्ठानोपरिस्तम्भं प्रस्तरं च त्रिवर्गकम् । कपोतप्रतिसंयुक्तं यत्तन्मण्डपमिष्यते ॥२५॥